Logo
International Journal of
Research in Hindi
ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 1 (2026)
दलित साहित्य का वैकल्पिक सौन्दर्यबोधः स्थापित मानदंडों को चुनौती
Authors
भगवान साहु
Abstract
साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका संवेदनशील व्याख्याकार भी होता है। प्रत्येक युग का साहित्य अपने समय के सौन्दर्यबोध से अनुप्राणित होता है। जब सामाजिक परिस्थितियाँ परिवर्तित होती हैं, तब सौन्दर्यमूल्य भी पुनर्परिभाषित होते हैं। इसी परिवर्तनशीलता ने साहित्य को गतिशील बनाए रखा है। दलित साहित्य इसी परिवर्तनशील प्रक्रिया का परिणाम है। यह केवल साहित्यिक धारा नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का आंदोलन है।
प्रस्तुत शोध आलेख स्थापित सौन्दर्यशास्त्रीय मानदंडों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता को दलित साहित्य के संदर्भ में स्पष्ट करता है। परंपरागत संस्कृत एवं पाश्चात्य सौन्दर्यशास्त्र जहाँ साहित्य की कलात्मकता, बिंब-योजना और अलंकरण को प्रमुखता देते रहे हैं, वहीं दलित साहित्य सामाजिक यथार्थ, अनुभव की प्रामाणिकता और मानवीय मूल्यों को केंद्र में रखता है। ओमप्रकाश वाल्मीकि, डॉ. सी. बी. भारती, डॉ. धर्मवीर तथा शरण कुमार लिंबाले जैसे चिंतकों के विचारों के आलोक में यह आलेख प्रतिपादित करता है कि दलित साहित्य का सौन्दर्यबोध समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मानवीय मूल्यों पर आधारित है। अतः इसे परंपरागत सौन्दर्य प्रतिमानों से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में मूल्यांकित किया जाना अपेक्षित है।
Download
Pages:25-28
How to cite this article:
भगवान साहु "दलित साहित्य का वैकल्पिक सौन्दर्यबोधः स्थापित मानदंडों को चुनौती". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 1, 2026, Pages 25-28
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.