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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं को डिजिटल युग में संरक्षित और संकलित करने की आवश्यकताएं
Authors
रवि प्रकाश सूरज
Abstract
भारतीय लोकसाहित्य की निरन्तरता मूलरूप से मौखिक परंपराओं पर टिकी हुई है। भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य भारतीय लोकसाहित्य परंपरा की सबसे सशक्त धाराओं में से एक हैं जिनमें इन क्षेत्रों की सामाजिक और सांस्कृतिक परम्पराएं जीवंत हैं। भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य की एक प्रमुख विधा लोकगाथा है। लोकगाथाएं हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक अमिट हिस्सा हैं जो मौखिक परंपरा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होते हुए लोककंठों में आज भी सुरक्षित हैं। आधुनिकता, शहरीकरण, बाजारवाद, मीडिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, डिजिटल युग के आगमन ने इन लोकगाथाओं के परंपरागत स्वाभाविक परिवेश को बहुत गहरे तौर पर प्रभावित किया है। जिसके परिणामस्वरूप पारंपरिक लोकगाथा गायकों, प्रदर्शन के अवसरों और मंच तीनों में तेजी से संकुचन आरंभ हुआ है। डिजिटल युग का दोहरा प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर है, जहां डिजिटल तकनीक ने एक तरफ लोकस्मृतियों के विघटन की प्रक्रिया को तेज किया है वहीं दूसरी ओर संरक्षण और संकलन की संभावनाओं के द्वार भी खोले हैं। प्रस्तुत शोधनिबंध में भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं के संदर्भ में संरक्षण और संकलन की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं और इन्हें व्यवस्थित स्वरूप में कैसे पूरा किया ज सकता है, इस पर चर्चा की गई है। 
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Pages:85-87
How to cite this article:
रवि प्रकाश सूरज "भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी लोकगाथाओं को डिजिटल युग में संरक्षित और संकलित करने की आवश्यकताएं". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 85-87
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