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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
भोजपुरी लोकगीतों में प्रवासन की पीड़ा: एक सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन
Authors
यशवंत कुमार सिंह
Abstract
भोजपुरी क्षेत्रों का लोकसाहित्य प्रवासन के अनुभवों
का एक सशक्त सांस्कृतिक दस्तावेज़ है। आर्थिक विवशता, कृषि संकट और सीमित
स्थानीय अवसरों के कारण भोजपुरी क्षेत्र में से लोगों का बड़े शहरों तथा परदेसों में प्रवासन लंबे समय
से होता रहा है। इस सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब भोजपुरी लोकगीतों में स्पष्ट रूप
से दिखाई देता है, जहाँ प्रवासी पुरुष की मानसिक पीड़ा, अकेलापन और अस्मिता-संकट
को मार्मिक अभिव्यक्ति मिली है। भोजपुरी लोकसाहित्य समाज की सामूहिक चेतना, ऐतिहासिक अनुभव और भावनात्मक संरचना का अनौपचारिक अभिलेख
होता है। लिखित इतिहास जहाँ सत्ता, नीतियों और संस्थाओं को केंद्र में रखता है, वहीं लोकगीत आम जन के जीवन-संघर्ष, पीड़ा और आकांक्षाओं को स्वर देते हैं। भोजपुरी लोकगीत इसी
परंपरा का सशक्त उदाहरण हैं। भोजपुरी लोकगीत प्रवासन पीड़ा का सबसे सशक्त माध्यम
है। “बिदेसिया”, “चैता”, “कजरी” और सोहर में प्रदेश गए पति, बेटा, या
प्रिये का इंतजार, स्त्री-मन के अकेलापन और टूटते पारिवारिक ढांचे का
मार्मिक चित्रण है।
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Pages:88-90
How to cite this article:
यशवंत कुमार सिंह "भोजपुरी लोकगीतों में प्रवासन की पीड़ा: एक सामाजिक और सांस्कृतिक अध्ययन". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 88-90
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