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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
बहुआयामी शिक्षक कैसा हो : एक विवेचन
Authors
डॉ. अमी राठौड़, उषा शर्मा
Abstract
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
श्री गुरु गीता के इस श्लोक के माध्यम से गुरु के महत्व को भलीभाँति समझा जा सकता है। प्रत्येक युग में गुरु का स्थान पूजनीय रहा है — वे ज्ञान, संस्कार और जीवन के आदर्श का प्रतीक माने गए हैं। यद्यपि काल, देश और परिस्थितियों के अनुसार गुरु की कार्यशैली में परिवर्तन होता रहा है, तथापि गुरु का मूल स्वरूप सदैव स्थिर और आदरणीय रहा है।
प्राचीन काल में जहाँ धनुर्विद्या या शास्त्रज्ञान को अनिवार्य माना जाता था, वहीं आज के युग में ज्ञान के प्रसार और नवाचारों के लिए भिन्न प्रकार के कौशल और तकनीकों की आवश्यकता है। आज मात्र पुस्तकीय ज्ञान प्रदान कर देना शिक्षण का पूर्ण उद्देश्य नहीं रह गया है। आधुनिक समाज में गुरु को शिक्षण के साथ-साथ प्रेरक, मार्गदर्शक, नवाचारी और तकनीकी रूप से दक्ष भी होना आवश्यक है।
समय की मांग के अनुरूप शिक्षक को अपने शिक्षण में नवीन विधियों, तकनीकी साधनों और सृजनात्मक दृष्टिकोण का समावेश करना चाहिए। आज का शिक्षण शिक्षक-केंद्रित न रहकर शिष्य-केंद्रित हो गया है, अतः शिक्षक को मनोवैज्ञानिक समझ, सहानुभूति, संवाद-कौशल और नेतृत्व जैसे गुणों से भी सम्पन्न होना चाहिए।
इस लेख में लेखिकाओं ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की आवश्यकताओं के अनुरूप बहुआयामी शिक्षक की संकल्पना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इसमें यह बताया गया है कि एक सच्चा आधुनिक शिक्षक केवल अपने विषय का ज्ञाता न होकर, सभी विषयों और जीवन के विविध पक्षों से परिचित,
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Pages:32-35
How to cite this article:
डॉ. अमी राठौड़, उषा शर्मा "बहुआयामी शिक्षक कैसा हो : एक विवेचन". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 32-35
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