ARCHIVES
VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
नब्बे के दशक में हिंदी साहित्यिक पत्रिका 'हंस' में प्रकाशित कविताओं में स्त्री विमर्श का स्वर
Authors
तुलसी छेत्री
Abstract
'विमर्श' शब्द की परिभाषा ऐसे तो नितांत व्यापक है लेकिन इसे सरल सटीक और कम शब्दों में समझा जाए तो किसी भी विषय विशेष के बारे में गंभीरता से चिंतन, विवेचन और उसका विश्लेषण करना ही विमर्श है। बीसवीं सदी के अंतिम दशक से ही स्त्री विमर्श ने वैश्विक, वैचारिक आंदोलन का स्वरूप ग्रहण किया, हालांकि भारतीय समाज में स्त्री विमर्श निश्चित रूप से पश्चिमी समाज से सर्वथा भिन्न है, भारतीय समाज में स्त्रियां विद्रोह करते हुए भी समाज से विमुख नहीं है। स्त्री विमर्श लिंग केंद्रित विषय है, जिसे स्त्री देह के साथ जोड़ कर देखा जाता रहा है, अकसर ये आरोप लगाया जाता है की यह पुरुष विरोधी है। इस अवधारणा को सही ढंग से समझा जाए तो हम पाएंगे की ये पुरुष प्रतिशोधात्मक न होकर, स्त्री का शोषण के विरुद्ध, समान अधिकार के लिए एक सकारात्मक प्रयास है। स्त्री विमर्श के केंद्र में, पितृसत्तामक सामाजिक व्यवस्था का विरोध कर, अपनी प्रतिष्ठा की स्थापना करना है।
हिंदी साहित्य और समाज में प्राचीन काल से ही स्त्रियों की भूमिका सीमित रही है। जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो सबसे पहले जो खाका सामने उभर कर आता है वो हिंदी साहित्य द्वारा निर्मित है। साहित्य की हर विधा ने नारी विमर्श के मुद्दों पर अपनी कलम चलाई है, फिर चाहे वो लेख हो, कहानियां, कविताएं, निबंध या संपादकीय विचार आदि। प्रस्तुत शोध पत्र में, हिंदी साहित्यिक पत्रिका श्हंसश् में नब्बे के दशक में प्रकाशित स्त्री विमर्श से सम्बंधित कविताओं पर विचार किया है।
Download
Pages:19-21
How to cite this article:
तुलसी छेत्री "नब्बे के दशक में हिंदी साहित्यिक पत्रिका 'हंस' में प्रकाशित कविताओं में स्त्री विमर्श का स्वर". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 19-21
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

