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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
गोरखनाथ कृत गोरक्षशतक में वर्णित शरीरगत वायु व मुख्य वायु की हठयोग क्रिया में भूमिका
Authors
सीमा सिंह
Abstract
शरीर में वायु का होना जीवन शक्ति का प्रतीक है वायु का शरीर से निष्क्रमण ही मरण है। अतः वायु का निरोध करना चाहिए।

यावद्वायुः स्थितो देहो तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिः ततो वायु निरोधयेत्।। 

वायु श्वास और चेतना के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध की गूढ़ समझ का सुझाव देता है। मानव शरीर में 10 वायु कार्यशील रहते हैं और इसे श्वास प्रक्रिया (प्राणायाम) द्वारा जाना जाता है हठयोग क्रिया द्वारा वायु के कार्यों को नियन्त्रित किया जाता है जिससे वायु के सभी आन्तरिक कार्य आत्मा को भौतिक आसक्ति से शुद्ध करने में सहायक सिद्ध हो। मानव इन्द्रियाँ आँख, नाक, कान, त्वचा, जिह्वा का कार्य क्रमशः देखना, सूँघना, सुनना, स्वाद है ये सभी इन्द्रियां मिलकर आत्मा से बाहर के कार्यों में लग जाती हैं। वायु के रहस्य को अच्छी तरह समझ लेने पर मानव लम्बे समय तक जीवित रहने का रहस्य जान लेता है यही वायु का मुख्य उद्देश्य है। वायु ही शरीर के भीतर अमृत या विष मंे बदलने की अद्भुत क्षमता रखता है।

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Pages:5-7
How to cite this article:
सीमा सिंह "गोरखनाथ कृत गोरक्षशतक में वर्णित शरीरगत वायु व मुख्य वायु की हठयोग क्रिया में भूमिका". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 5-7
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