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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 6, ISSUE 2 (2024)
शंकर शेष कृत ‘बिन बाती के दीप’ नाटक में अभिव्यक्त स्त्री-पुरुष सम्बन्ध
Authors
डॉ० दर्शन पाण्डेय, अनुराधा
Abstract
“बिन बाती के दीप“ नाटक शंकर शेष जी द्वारा (1968) रचित एक अनुपम कृति है। बीसवीं सदी के साठोत्तरी नाटककारों में डा० शंकर शेष का हिन्दी नाट्य जगत में एक विशिष्ट स्थान माना जाता है। इनके नाटकों में समसामयिक एवं युगीन संदर्भों का सार्थक चित्रण हुआ है। शेष जी के नाटक कथ्य और रंगमंचीय शिल्प दोनों ही दृष्टियों से सफल रहे हैं। इनके नाटक ह्रदय एवं बुद्धि से जुड़ी जटिलताओं, सामाजिक विसंगतियों के उद्घाटन से संबंधित हैं। जो समसामयिक संदर्भों, विवादों तथा जीवन की व्याख्या करने में भी सक्षम हैं। वैसे तो शंकर शेष ने अपने जीवन काल में कविता, कहानी एवं उपन्यास भी लिखे, परंतु नाटककार के रूप में वे ज़्यादा सफ़ल हुए। शंकर जी ने अपने नाटकों में समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा किया। उनका लेखन दर्शकों को सामाजिक प्रतिबद्धताओं से तो जोड़ता ही है, उनमें बेचौनी और त्रासद के बीच लाकर सोचने, चिंतन करने को भी विवश करता है। शंकर जी के नाटकों की सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इनके नाटकों के पात्र हर तरह की स्थिति में संघर्षरत रहते हैं कभी भी पलायन की बात नहीं सोचते। ‘बिन बाती के दीप‘ नाट्य रचना में शंकर जी ने पति-पत्नी के संबंधों को प्रस्तुत किया है। इस नाटक में शिवराज अपनी अंधी पत्नी विशाखा के चारों और झूठ का ऐसा संसार रच देता है कि वह चाह कर भी अपने पति पर आशंका नहीं कर पाती और सब कुछ जानने के उपरांत उसे माफ़ कर देती है।
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Pages:5-7
How to cite this article:
डॉ० दर्शन पाण्डेय, अनुराधा "शंकर शेष कृत ‘बिन बाती के दीप’ नाटक में अभिव्यक्त स्त्री-पुरुष सम्बन्ध". International Journal of Research in Hindi, Vol 6, Issue 2, 2024, Pages 5-7
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