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VOL. 5, ISSUE 3 (2023)
शिवानी के उपन्यासों में नारी चिंतन
Authors
डॉ. विजय श्रावण घुगे
Abstract
उपन्यास आधुनिक गद्य साहित्य की प्रमुख विधा मानी जाती है, जिसमें लेखक अपना पूरा ब्यौरा पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं। उपन्यास जगत में उपन्यासकार समाज, परिवेश, संस्कृति तथा देशकाल को केंद्र में रखकर अपनी भूमिका निभाता हैं, इसलिए गद्य साहित्य की उपन्यास विधा प्रेमचंदयुग से काफी सफल रही हैं।
कहानी के क्षेत्र में पाठकों और लेखकों की रुचि निर्मित करने तथा कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने का श्रेय शिवानी को जाता है। वह कुछ इस तरह लिखती थीं कि लोगों की उसे पढने को लेकर जिज्ञासा पैदा होती थी। उनकी भाषा शैली कुछ-कुछ महादेवी वर्मा जैसी रही पर उनके लेखन में एक लोकप्रिय किस्म का मसविदा था। उनकी कृतियों से यह झलकता है, कि उन्होंने अपने समय के यथार्थ को बदलने की कोशिश नहीं की। शिवानी की कृतियों में चरित्र चित्रण में एक तरह का आवेग दिखाई देता है। वह चरित्र को शब्दों में कुछ इस तरह पिरोकर पेश करती थीं जैसे पाठकों की आंखों के सामने राजा रवि वर्मा का कोई खूबसूरत चित्र तैर जाए। उन्होंने संस्कृत निष्ठ हिंदी का इस्तेमाल किया। जब शिवानी का उपन्यास कृष्णकली ख्धर्मयुग, में प्रकाशित हो रहा था तो हर जगह इसकी चर्चा होती थी। मैंने उनके जैसी भाषा शैली और किसी की लेखनी में नहीं देखी। उनके उपन्यास ऐसे हैं जिन्हें पढकर यह एहसास होता था कि वे खत्म ही न हों। उपन्यास का कोई भी अंश उसकी कहानी में पूरी तरह डुबो देता था।
भारतवर्ष के हिंदी साहित्य के इतिहास का बहुत प्यारा पन्ना थीं। अपने समकालीन साहित्यकारों की तुलना में वह काफी सहज और सादगी से भरी थीं। उनका साहित्य के क्षेत्र में योगदान बडा है वर्तमान युग में शिक्षित नारी स्वतंत्र अस्तित्व की कामना कर रही हैं, इसे पूरा करने के लिए नारी को बहुत सारी कठिनाईयों का सामना करना पड रहा हैं। इस बात को शिवानी ने अपने उपन्यासों में बहुत ही बखुबी से स्पष्ट किया हैं।
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Pages:5-7
How to cite this article:
डॉ. विजय श्रावण घुगे "शिवानी के उपन्यासों में नारी चिंतन". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 3, 2023, Pages 5-7
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