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VOL. 5, ISSUE 2 (2023)
साहित्य शास्त्र की कसौटी पर अलंकारों की उपादेयता
Authors
डॉ. अजय कुमार श्रीवास्तव
Abstract
भारतीय साहित्य परम्परा में अलंकार की महत्ता को नकारा नही जा सकता। प्रारंभ में आचार्य भामह ने इसका पुरजोर समर्थन करते हुए इस संप्रदाय की स्थापना की। इस संप्रदाय के महत्व को इस बात से भी जाना जाता है कि सम्पूर्ण काव्य शास्त्र का नाम ही अलंकार शास्त्र के नाम से जाना जाने लगा। तप्श्चत आचार्य दंडी, आचार्य वामन आदि आचार्यों का अभिमत भी अलंकार के पक्ष में रहा है। यहातक की अलंकारों की प्रासंगिकता के सन्दर्भ में संस्कृत और हिंदी के आलोचक भी इसको किसी न किसी रूप में स्वीकार करते है। आचार्य मम्मट अपने काव्य प्रकाश में इसकी प्रासंगिकता, महत्ता को “तद दोषौ शब्दार्थौ सगुणावळंकृति पुनः क्वापि“ के रूप में स्पष्ट करते है। इस तरह अलंकार चाहे वाह्य और आतंरिक उपादान के रूप में हो या सौन्दर्य को उद्घाटित करने के लिए अथवा कवि चमत्कार के लिए या रस की निष्पत्ति में सहायक के रूप में हो, अलंकार की महत्ता को स्वीकार करना ही होगा।
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Pages:12-13
How to cite this article:
डॉ. अजय कुमार श्रीवास्तव "साहित्य शास्त्र की कसौटी पर अलंकारों की उपादेयता". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 2, 2023, Pages 12-13
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