ARCHIVES
VOL. 5, ISSUE 2 (2023)
नई कहानी में पितृसत्तात्मक विद्रोह का चित्रण
Authors
डॉ. ज्ञानी देवी गुप्ता
Abstract
साहित्य मे पितृसत्तात्मक विद्रोह अस्मिता की पहचान लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद हिन्दी साहित्य में ‘समकालीन साहित्य’ विशेष चर्चित रहा है। इस साहित्य में चाहे कथा, उपन्यास हो या फिर कविता सभी में समय के साथ बदलता यथार्थ चित्रण दिखलायी देता है। स्वतंत्रता पूर्व भारतीय समाज-साहित्य पूर्णतः स्वतंत्रता पाने के लिए लालायित था। स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक अस्थिरता का दौर आया। साथ ही बौद्धिक चिंतन में यथार्थ आ गया। स्वतंत्रता के बाद में आम आदमी घुटन, गरीबी, बेरोजगारी और विवशता में जीने के लिए मजबूर रहा है। योजनाएँ फाइलों की संख्या बढ़ाती रही। डार्विन के बाद मानव के विकास की कहानी में बहुत कुछ जुड़ा। हमारे लिए इस कहानी का पहला अध्याय यहाँ जिसे शिकार-संग्रह पितृसत्तात्मक बोध या पुरापाषाण पितृसत्तात्मक बोध के नाम से जाना जाता है। कारण, इस पितृसत्तात्मक बोध में मनुष्य आजीविका के लिए सीध्र प्रकृति पर निर्भर था। वाशबर्न और लैंकेस्टर का मत है कि केवल पुरुष ही शिकार पर जाया करते थे। स्त्रियाँ उनके साथ शरीक नहीं होती थीं।
Download
Pages:14-16
How to cite this article:
डॉ. ज्ञानी देवी गुप्ता "नई कहानी में पितृसत्तात्मक विद्रोह का चित्रण". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 2, 2023, Pages 14-16
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

