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VOL. 5, ISSUE 1 (2023)
आधुनिक संस्कृत साहित्य में लोकजीवन की अवधारणा (लोकगीतों के विशेष संदर्भ में)
Authors
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता
Abstract
आधुनिक साहित्य में लोकजीवन महत्वपूर्ण विमर्श का आधार है, क्योंकि इसका संबंध परंपरा और संस्कृति से है । लोक साहित्य सामूहिक राग है, जिसमें पर्सनल कुछ नहीं होता है, यदि है तो सामूहिक। लोक स्वयं में एक संपूर्ण शब्द है । लोक शब्द संस्कृत के ‘लोकदर्शने’ धातु में ‘घञ् प्रत्यय’ से बना है जिसका अर्थ है - देखने वाला । वास्तव में लोक का अर्थ उस समाज से है जो विस्तृत रूप से इस पृथ्वी पर फैला हुआ है और जिसमें सभी प्रकार के मनुष्य सम्मिलित हैं । लोकसत्ता का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना प्राचीन मनुष्य जाति का इतिहास है । साहित्यकार के काल्पनिक जगत की आधारभूमि का निर्माण लोक से होता है । वह अपनी बात कहने के लिए लोककथाओं को आधार बनाता हैं, नहीं तो किसी लोग जनश्रुति को अपनी काव्य का अधार बनाता है । लोकगीत की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन है संभवत सृष्टि के आरंभ से ही इसकी परंपरा रही है । लोकगीत हमारे जीवन विकास की गाथा है । उनमें जीवन के सुख-दुख, मिलन, विरह जैसे उतार-चढ़ाव की भावनाएं व्यक्त हुई हैं । सामाजिक रीति एवं कुरीतियों के भाव इन लोकगीतों में हैं । इनमें जीवन की सरल अनुभूतियों एवं भावों की गहराई है । लोकगीतों को मात्र ग्राम गीत नहीं कहा जा सकता । लोकगीतों की कई विधाएँ संस्कृत साहित्य में उपलब्ध है । वस्तुतः लोकगीत, लोकजीवन का अभिन्न अंग है । केवल मनोरंजन या वैचारिक मंथन ही उनका लक्ष्य नहीं है बल्कि उनका मूल प्रयोजन मानव मात्र के जीवन से जुड़ा हुआ है एवं उसके कल्याण से जुड़ा हुआ है ।
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Pages:16-18
How to cite this article:
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता "आधुनिक संस्कृत साहित्य में लोकजीवन की अवधारणा (लोकगीतों के विशेष संदर्भ में)". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 1, 2023, Pages 16-18
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