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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 5, ISSUE 1 (2023)
पद्मावत का मनोवैज्ञानिक अध्ययन
Authors
डॉ तबस्सुम खान, आशा चन्दन बारेकर
Abstract
बीसवी शताब्दी में हमारा हिन्दी साहित्य विविध क्षेत्रों में अनेक नई दिशाओं की ओर अग्रसर हुआ है। उसमें नई-नई साहित्यिक विधाओं, नये-नये शिल्पों, प्रतिको विचार पद्वति का समावेश हुआ है, इसलिए समीक्षा के क्षेत्र में भी नवीन दृष्टिकोणों एवं प्रणालियों का विकसित होना स्वाभाविक ही है। कहने का अभिप्राय है कि मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन भी इसी विकास का परिणाम है। मानसिक प्रवृत्तियों एवं भावानुभूतियों की सहज कलात्मक अभिव्यक्ति को ‘‘साहित्य’’ कहा जाता है तो उनका वैज्ञानिक अनुशीलन मनोविज्ञान की संज्ञा से विभूषित हाता है। इस दृष्टि से साहित्य और मनोविज्ञान की आधारभूत सामग्री एक ही है। अन्तर केवल उनके लक्ष्य एवं प्रयोग पद्वति का है। एक का लक्ष्य उन्हें रंग-बिरंगे रूपों में प्रस्तुत करते हुए सौन्दर्य सृष्टि करना है तो दूसरे में उनका विवेचन विश्लेषण करते हुए सत्यानुसंधान करना होता है। इस अन्तर के होते हुए भी वस्तुगत साम्य के कारण वे एक-दूसरे के पूरक एवं साधक सिद्व होते है। इतना ही नहीं जब हम साहित्यानुशीलन में भी सौन्दर्यानुभूति के स्थान पर तत्वानुसंधान के लक्ष्य से प्रवृत्त होते है तो वहां मनोविज्ञान का आश्रम ग्रहण करना आवश्यक हो जाता है। यही कारण है कि साहित्य-समीक्षा के क्षेत्र में चाहे वह भावानुभूतियों को आधार मानकर चलने वाली रस सिद्वांत हो या कल्पना-शक्ति पर बल देने वाला विम्ब सिद्वांत हो अथवा फ्रॉयड जुंग का आधुनिक स्वप्न प्रतीक सिद्धांत हो मनोविज्ञान का आश्रय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रायः ग्रहण किया जाता है। साहित्यानुसंधान एवं साहित्य विज्ञान के क्षेत्र में निश्चित् ही मनोविज्ञान सम्मत सिद्वांतों को ही साहित्य-वस्तु के परीक्षण का आधार बनाया जाता हैं। साहित्य में साहित्यकार के व्यक्तित्व की छाप होती है। यह कथन तो सर्वथा निर्विवाद है। अतः किसी भी कवि के व्यक्तित्व का विश्लेषण बाध्य साक्ष्यों के आधार पर ही नहीं अपितु अन्तः साक्ष्यों के आधार पर भी किया जा सकता है। इन अन्तः साक्ष्यों में कवि का व्यक्तित्व स्वतः ही काव्य में प्रतिविम्बित होता है। जायसीकृत पद्मावत ‘‘जायसी का प्रेमाख्यान काव्य है। जायसी ने बहुत ही मार्मिक एवं भावपूर्ण परिस्थिति का उल्लेख कर एक पक्षी की नागमती के प्रति संवेदनशीलता दर्शायी है। जिस कवि के पक्षी ही इतने संवेदनशील हो, वह कवि स्व्यं कितना संवेदनशील होगा यह कहने की आवश्यकता नहीं। जिस प्रकार जायसी के भावुक हृदय ने मानव के सूक्ष्मतम नूतन भावनाओं को खोज कर उनकी अभिव्यक्ति की थी, उसी प्रकार उन्होंने मानव मनोविज्ञान के सूक्ष्मातिसूक्ष्म रहस्यों का उद्घाटन किया था। प्रणय मनोविज्ञान में जायसी जी अप्रतिम पारखी थे। जब प्रेमी घोर साधना के बाद प्रेमिका को प्राप्त करने में समर्थ होता है
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Pages:4-6
How to cite this article:
डॉ तबस्सुम खान, आशा चन्दन बारेकर "पद्मावत का मनोवैज्ञानिक अध्ययन". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 1, 2023, Pages 4-6
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