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VOL. 4, ISSUE 1 (2022)
आधे-अधूरेः पारिवारिक जीवन की त्रासदी
Authors
मीनाक्षी
Abstract
आधुनिक और यथार्थवादी भाव संवेदना से युक्त मोहन राकेश कृत नाटक ‘आधे अधूरे’ समसामयिक जिंदगी का दस्तावेज है। इस नाटक में वर्तमान समकालीन जीवन की विसंगतियों और आधुनिक मानव की नियति और उसके अस्तित्व के संकट को दिखाया गया है। एक स्तर पर यह नाटक स्त्री-पुरुष संबंधों के तनाव और बिखराव को रेखांकित करता है तो दूसरी तरफ इसमें मध्यवित्तीय स्तर से निम्न मध्यवित्तीय स्तर पर आते हुए शहरी परिवार का विघटन होते हुए दिखाया गया है। ‘समूचा नाटक घर और घर में रहने वाले लोगों के अधूरेपन की कथा व्यंजित करता है। वह घर ऐसा है, जो घर के अतिरिक्त सब कुछ है क्योंकि वहां घर नामक शब्द के अस्तित्व में सम्पृक्त अपनेपन के स्थान पर अनचाहे संबंधों का बिखराव और ऊबभरे व्यवहार की गर्द है। आधे-अधूरे नाटक की सर्जना का मूल बिंदु घर की तलाश है।’ घर गृहस्थी बसाने के लिए जिस समन्वय और सहयोग की अपेक्षा होती है। इस नाटक में इनका सर्वथा अभाव दिखता है।
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Pages:21-23
How to cite this article:
मीनाक्षी "आधे-अधूरेः पारिवारिक जीवन की त्रासदी". International Journal of Research in Hindi, Vol 4, Issue 1, 2022, Pages 21-23
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