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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 3, ISSUE 3 (2021)
छायावाद की पृष्ठभूमि और रामचंद्र शुक्ल का ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’
Authors
डॉ. आभा शर्मा
Abstract
आचार्य रामचंद्र शुक्ल विधेयवादी दृष्टि के साहित्येतिहासकार हैं। उन्होंने 1929 ई. में हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा। इस साहित्येिहास ग्रंथ को हिंदी साहित्य का पहला प्रौढ़ साहित्येतिहास ग्रंथ भी कहा जाता है क्योंकि इसमें न केवल काल विभाजन और नामकरण की सुसंगत एवं स्पष्ट व्यवस्था थी बल्कि शुक्ल जी द्वारा साहित्येतिहास की सामग्री के मूल्यांकन एवं विश्लेषण हेतु व्यापक दृष्टिकोण को भी अपनाया गया था। शुक्ल जी के साहित्येतिहास लेखन के प्रयास की सीमाओं के अंतर्गत अन्य बिंदुओं के साथ छायावाद को भी शामिल किया जाता है। एक प्रकार से यह कहा जा सकता है कि छायावाद की सर्वप्रथम विधिवत व्याख्या आचार्य शुक्ल ने ही प्रारम्भ की थी। उनके समय तक छायावाद नामकरण तो प्रचलित हो चुका था किंतु उसके अर्थ को लेकर एक अनिश्चयात्मकता बनी हुई थी। शुक्ल जी ने अपने साहित्येतिहास में इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया है इसके अंतर्गत उन्होंने जहां एक तरफ छायावाद को अनुकरण के संदर्भ में फेंटसमाटा आंदोलन तथा बंगला काव्य के छायाभास/रहस्यवाद से जोड़ा है वहीं दूसरी तरफ इसकी व्याख्या अभिव्यक्ति शैली की दृष्टि से प्रतीकवाद के माध्यम से करते हैं। आगे चलकर इसे ही आधार बनाकर कई आलोचकों ने छायावाद की विस्तृत व्याख्या की।
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Pages:37-41
How to cite this article:
डॉ. आभा शर्मा "छायावाद की पृष्ठभूमि और रामचंद्र शुक्ल का ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 3, 2021, Pages 37-41
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