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VOL. 3, ISSUE 3 (2021)
आदिवासी जीवन के दस्तावेज़: नारायण के मलयालम उपन्यास
Authors
डॉ. उषा नायर
Abstract
आदिवासियों के मलअरयार समुदाय की मलयालम साहित्य-जगत में जो विशेष पहचान है, उसका श्रेय जाता है इसी समुदाय के सदस्य, विख्यात उपन्यासकार श्री नारायण को। साहित्य जगत की दृष्टि में आदिवासियों की मूलरूढ छवि को नारायण संशोधित करना चाहते हैं और यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि वह प्रकृति के साथ समरसता में जीने वाला ऐसा कठिन परिश्रमी जन समुदाय है जिसके स्पष्ट जीवन मूल्य और सांस्कृतिक वैशिष्ट्य हैं। नारायण ने समुदाय-वशेष की जीवन शाली, रीति रिवाज़, सांस्कृतिक संकट, वन अधिकारियों और शहरी लोगों द्वारा उद्धार के नाम पर किये जा रहे शोषण आदि का सविस्तार चित्रण किया है। आदिवासियों के अधिकांश रीति-रिवाज़ मनुष्य के जीवन-चक्र के महत्वपूर्ण पडावों से जुडे हैं। जन्म, विवाह, दाह संस्कार से जुडी उनकी रस्में निराली हैं। प्रकृति और देवता उनके दैनिक जीवन में वे ऐसे घुल-मुल गये कि उनका प्रखंडीकरण संभव नहीं है। वे अपने देवताओं में क्रोध, निराशा, खुशी, संतोष, दुःख जैसे मानव सहज, गुणों को आरोपित करते हैं। आदिवासियों की पहचान उनके परिवेश से अभिन्न है और उनका वजूद ज़मीन, पहाडों, पानी, सूरज, पेडों और सहजीवियों के साथ गहराई से जुडा है। ज़मीन से उन्हें बेदखल किया जा सकता है, परिष्कृत समाज की यह व्यवस्था उनकी समझ से बाहर है। बाहरी दुनिया से लेन-देन कभी भी उनके हित में नहीं हो पाता क्योंकि तथाकथित परिष्कृत समाज की चुतराई का सामना आदिवासी अपनी सरल, अनपढ बुद्धि के सहारे नहीं कर पाते।
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Pages:33-36
How to cite this article:
डॉ. उषा नायर "आदिवासी जीवन के दस्तावेज़: नारायण के मलयालम उपन्यास ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 3, 2021, Pages 33-36
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