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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
निर्गुण काव्य परम्परा में गुरु जम्भेश्वर का स्थान
Authors
ममता रानी
Abstract
साहित्य समाज का प्रतिबिम्ब होने के साथ-साथ परिस्थितियों की उपज भी होता है। समाज में जिस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार के साहित्य की रचना होती है। ईश्वर के सम्बन्ध में भी समाज में दो प्रकार के मत हमारे सामने आते हैं- प्रथम निर्गुण तथा दूसरा सगुण। वैदिक युग से लेकर समाज की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परिस्थितियाँ निरंतर परवर्तित होती रही। इन परिस्थितियों के अनुरूप ईश्वर के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों पर चिंतन-मनन होता रहा। हिन्दी साहित्य के मध्यकाल (भक्तिकाल) तक भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित होती रही है परन्तु जैसे प्रत्येक व्यक्ति का किसी वस्तु को देखने का दृष्टिकोण भिन्न-भिन्न होता है, वैसे ही ईश्वर के सम्बन्ध में भी दृष्टिकोण में भेद दिखाई देने लगा। ब्रह्म के स्वरूप को लेकर निर्गुण-सगुण की चर्चा प्रायः होने लगी। कोई ब्रहम के निर्गुण रूप अर्थात जो न पैदा होता है न मरता है, की उपासना करने लगे तथा कोई सगुण अर्थात साकार, मूर्तिमान ईश्वर के उपासक बन गये। इन दोनों धाराओं का पूर्ण परिपाक भक्तिकाल में हुआ। वेदों में उस परब्रह्म की उपासना प्राकृतिक देवी-देवताओं के रूप में की जाती थी। उपनिषदों में ब्रह्म के विषय में चिंतन प्रारम्भ हुआ। श्वेताश्वेतारोपनिषद ने सर्वप्रथम ब्रह्म को निर्गुण की संज्ञा दी और उसे सर्वव्यापी एवं सर्वभूतात्मा में निवास करने वाला कहा है। आगे चलकर शन्कराचार्य ने निर्गुण शब्द का प्रयोग कई बार किया है। सिद्धों एवं नाथों की वाणी का मूल प्रतिपाद्य उस निर्गुण-निराकार परमात्मा की भक्ति करना था। रामानुजचार्य की शिष्य परम्परा में रामानंद जी हुए जिनके उदार व्यक्तित्व के कारण निर्गुण एवं सगुण दोनों धाराओं का विकास हुआ। हिंदी साहित्य के मध्यकाल तक समाज में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थी, जिनका निवारण करने के लिए संत-महापुरुषों ने साधारण लोगों को निर्गुण-निराकार परमात्मा की ओर उन्मुख किया। इन संतों ने अपने इष्ट को ही निर्गुण नहीं कहा अपितु अपने सैद्धान्तिक मत को भी निर्गुण नाम दे दिया। इन संतों ने तत्कालीन समाज में व्याप्त आडम्बरों का खंडन करते हुए ब्रह्म के निर्गुण रूप की उपासना पर बल दिया। कबीर, गुरु नानक, गुरु जम्भेश्वर, दादू दयाल, सुंदर दास आदि संतों ने अपनी वाणी के द्वारा अज्ञानता के अंधकार में फसे लोगों का मार्गदर्शन किया। उत्तर भारत की धरती से दूर राजस्थान में गुरु जम्भेश्वर ने ‘बिश्नोई’ सम्प्रदाय की स्थापना करके बाह्यडम्बर में फसे तत्कालीन समाज को जीवन यापन करने का एक उचित ढंग प्रदान किया। इनके द्वारा प्रतिपादित नियम आज भी जीवन को एक दिशा देने का कार्य करते हैं।
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Pages:01-03
How to cite this article:
ममता रानी "निर्गुण काव्य परम्परा में गुरु जम्भेश्वर का स्थान ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 01-03
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