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VOL. 3, ISSUE 1 (2021)
भारतीय इतिहास-लेखन का पाश्चात्य दृष्टिकोण तथा राष्ट्रवादियों की प्रतिक्रिया: आलोचनात्मक अध्ययन
Authors
श्वेता राज
Abstract
भारतीय भाषा, साहित्य और इतिहास के अध्ययन और उसके इतिहास-लेखन के पीछे तत्कालीन यूरोपीय विद्वानों के औनिवेशिक उद्देश्यों का अध्ययन करना और भारतीय राष्ट्रवादी लेखकों ने इसका प्रतिउत्तर किस प्रकार दिया, इसका अध्ययन प्रस्तुत लेख का उद्देश्य है। एक तरफ, ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने साम्राज्यवादी पकड़ को मजबूत बनाने के उद्देश्य से यहाँ के कानून-व्यवस्था, भाषा, धर्म, साहित्य, इतिहास और संस्कृति के अन्य महत्त्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन जरुरी समझा। दूसरी तरफ, उन्होंने भारतीय इतिहास को एक ख़ास तरीके से परिभाषित किया। आवश्यकतानुसार उसे कभी महान तथा कभी हीन साबित किया और अपनी ‘फूट डालो, राज करो’ नीति के तहत भारतीय इतिहास में सदा के लिए साम्प्रदायिकता का बीज बो दिया। इन यूरोपीय विद्वानों में तमाम वैचारिक मदभेद होने के बावजूद एक बात पर सहमति थी कि यह देश सदा से निरंकुश शासन का शिकार रहा है और ब्रिटिश प्रशासन के ‘लोकतान्त्रिक शासन’ से तहत ही उसे मुक्ति मिल सकती है। गौरतलब है कि इस मुक्ति का रास्ता हमेशा-हमेशा की गुलामी से खुलता था। राष्ट्रवादी मनिषाओं और आन्दोलनकारियों ने इसका प्रतिउत्तर देने का भरपूर प्रयास किया और भारतीय इतिहास को अपने ढ़ंग से परिभाषित करने की कोशिश की। पर अपने इतिहास लेखन में वह भी उसी अनैतिहासिकता के शिकार होते हैं, जिससे यूरोपीय लेखक ग्रसित थे। फलस्वरूप, दोनों ने ही भारतीय इतिहास के सामाजिक और आर्थिक पक्ष को दरकिनार कर दिया और राजवंशों का इतिहास लिखा। समाज के एक बड़े वर्ग को इस इतिहास से दरकिनार कर दिया गया। इस सभी पक्षों का अध्ययन इस लेख का उद्देश्य है।
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Pages:11-15
How to cite this article:
श्वेता राज "भारतीय इतिहास-लेखन का पाश्चात्य दृष्टिकोण तथा राष्ट्रवादियों की प्रतिक्रिया: आलोचनात्मक अध्ययन". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 1, 2021, Pages 11-15
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