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VOL. 2, ISSUE 3 (2020)
भक्तिकालीन साहित्य में सामाजिक समरसता की अवधारणा
Authors
सीमा कुमारी मीणा
Abstract
भक्तिकालीन साहित्य हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसने सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर व्यापक परिवर्तन की दिशा प्रदान की। इस साहित्य में सामाजिक समरसता की अवधारणा विशेष रूप से प्रमुख रूप में उभरकर सामने आती है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि भक्तिकालीन संत कवियों ने अपने काव्य और विचारों के माध्यम से किस प्रकार समाज में समानता, बंधुत्व और मानवता के मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया।
भक्तिकाल के समय भारतीय समाज अनेक प्रकार की असमानताओं, जातिगत विभाजनों और धार्मिक कट्टरताओं से प्रभावित था। ऐसे परिवेश में संत साहित्य ने एक नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जिसमें मनुष्य को उसकी जाति, धर्म और सामाजिक स्थिति से ऊपर उठाकर देखा गया। संत कवियों ने ईश्वर की एकता और मानवता की समानता का संदेश देकर समाज में व्याप्त भेदभाव का विरोध किया। भक्तिकालीन साहित्य केवल आध्यात्मिक चेतना का माध्यम नहीं था, बल्कि यह सामाजिक सुधार का भी एक प्रभावी साधन था। संतों की वाणी में सरलता, लोकभाषा का प्रयोग और जनसामान्य से सीधा संवाद उनकी विचारधारा को व्यापक स्तर पर पहुँचाने में सहायक बना। भक्तिकालीन साहित्य में प्रस्तुत सामाजिक समरसता की अवधारणा आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक समाज में भी विभिन्न प्रकार के विभाजन और असमानताएँ विद्यमान हैं। इस दृष्टि से यह साहित्य समकालीन समाज के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
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Pages:26-30
How to cite this article:
सीमा कुमारी मीणा "भक्तिकालीन साहित्य में सामाजिक समरसता की अवधारणा". International Journal of Research in Hindi, Vol 2, Issue 3, 2020, Pages 26-30
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