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VOL. 2, ISSUE 3 (2020)
समकालीन हिंदी कहानियों में बाज़ारवादी संस्कृति
Authors
मेरी रिया डिकाउथ
Abstract
मानव द्वारा अपने जीनव को तरीके से जीने की प्रविधि है - संस्कृति । ‘संस्कृति’ का अर्थ हुआ, ‘शुद्ध किया हुआ’, ‘परिष्कृत एवं परिमार्जित करना’ । संस्कृति एक निरंतर प्रवाहमान धारा है । वह नए संदर्भों से टकराती है और अपने को और उन संदर्भों को भी अनुकूलित करती चलती है । भारतीय संस्कृति की खास विशेषता है ‘अनेकता’ में ‘एकता’ और ‘एकता’ में ‘अनेकता’ । हड़प्पा संस्कृति से लेकर आज हम प्रौद्योगिक संस्कृति तक आकर खड़े हैं । हमारे सांस्कृतिक इतिहास में एक अनोखी परिघटना है ‘भूमण्डलीकरण’ । यह मूलतः विश्व पूँजीवाद का भूमण्डलीकृत रूप है । औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप ने भूमण्डलीकरण के पहले चक्र में प्रवेश करके दुनिया के देशों को अपना उपनिवेश बनाया । भूमण्डलीकरण के इस पहले चरण में साम्राज्यवाद फैला । दुनिया भर के देश गुलाम हुए और उनका दोहन शोषण हुआ । उनमें आज़ादी की ल़ड़ाई लड़ी गई । इसी प्रक्रिया में उन समाजों में आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ शुरु हुई । इसे भूमण्डलीकरण का पहला चक्र या चरण कहा जा सकता है । आज हम भूमण्डलीकरण के तीसरे चरण पर हैं । भूमण्डलीकरण जनतांत्रिक हिस्सेदारी का खात्मा करते हुए सशक्त बना । भूगोल को एक मण्डी बनाना उस्का प्रथम उद्देश्य रहा है । भूमण्डलीकरण का सबसे प्रमुख मुद्दा है बाज़ारवाद । समकालीन कहानियों में बाज़ारवादी संस्कृति का चित्रण काफी ज़ोर से हुआ है ।
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Pages:15-17
How to cite this article:
मेरी रिया डिकाउथ "समकालीन हिंदी कहानियों में बाज़ारवादी संस्कृति". International Journal of Research in Hindi, Vol 2, Issue 3, 2020, Pages 15-17
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