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VOL. 1, ISSUE 2 (2019)
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हठयौगिक मुद्राओं की उपयोगिता: एक अध्ययन
Authors
जयराम कुशवाहा
Abstract
आधुनिक जीवन की भाग-दौड भरी जिन्दगी में आज भी लोग स्वयं की स्वस्थ और खुशहाल जिन्दगी के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है ऐसे में योग विज्ञान मानव के लिए एक वरदान साबित हुआ है वास्तव योग एक जीवन जीने की कला है। वर्तमान में योग की अनेक परम्परायें हठयोग, राजयोग, मंत्रयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और तंत्रयोग आदि प्रचलित है, आधुनिक समय में हठयोग सर्वप्रचलित है जिससें साधक स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर निरन्तर बढ़ने का प्रयास करते हुए योग की उच्च अवस्था राजयोग तक पहुँच जाता है। हठयोग की साधना का मुख्य उद्देश्य सूर्य अर्थात् दायीं नासिका और चन्द्र अर्थात् बायीं नासिका के माध्यम से प्राण-अपान का समयोग करना है इस एक्य से प्राण का संचार सुषुम्ना नाड़ी में हो जाता है जिसके फलस्वरूप मनुष्य की सुषुप्त शक्तियों के रूप में स्थित कुण्ड़लिनी शक्ति का जागरण होता है।
हठप्रदीपिका के तीसरे अध्याय में दस मुद्राओं का विशेष महत्व है, इन हठयौगिक मुद्राओं के अभ्यास से साधक शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को प्राप्त कर लेता है। हठयौगिक गन्थों में मुद्राओं को आसन-प्राणायाम के बाद वर्णित किया गया है। हठयोग के सभी गन्थों में बन्धों को मुद्राओं के अंर्तगत ही माना गया है इसीलिए योगियों ने मुद्राआंे का अभ्यास प्राणायाम के बाद कुम्भक के समय करना उचित है। मुद्राओं के नियमित अभ्यास से प्राण ऊर्जा का प्रवाह निरन्तर बना रहता है जिससे साधक के शरीर में झुर्रियां, सफेद बाल, उदर संबंधि रोग, आधि-व्याधि एवं जरा-मरण आदि महादोश नहीं आते हैं।
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Pages:12-15
How to cite this article:
जयराम कुशवाहा "वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हठयौगिक मुद्राओं की उपयोगिता: एक अध्ययन". International Journal of Research in Hindi, Vol 1, Issue 2, 2019, Pages 12-15
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