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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय चेतना: हिन्दी साहित्य के विशेष संदर्भ में
Authors
विनय खाण्डेकर, डॉ. स्नेहलता निर्मलकर
Abstract
भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्ध ज्ञान परम्पराओं में से एक है। इसका आधार केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय पक्षों को भी समान रूप से प्रभावित करती है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, बौद्ध एवं जैन साहित्य तथा भारतीय दर्शन की विविध धाराओं ने ज्ञान, कर्तव्य, सत्य, अहिंसा, समन्वय, जनकल्यांण और वसुधैव कुटुम्बकम जैसी सार्वभौमिक मान्यताओं का विकास किया। यही मूल्य आगे चलकर भारतीय समाज की राष्ट्रीय चेतना के आधार बने। हिन्दी साहित्य ने इन मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक हिन्दी साहित्यकारों ने भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय अस्मिता, सामाजिक समरसता तथा स्वतंत्रता चेतना को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान की। विशेष रूप से भारतेंदु हरिश्चन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचन्द, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह दिनकर, जयशंकर प्रसाद तथा अन्य साहित्यकारों ने भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल तत्वों को राष्ट्रीय चेतना के साथ जोडकर प्रस्तुत किया। उनके साहित्य में राष्ट्र केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। वर्तमान वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद तथा तकनीकी परिवर्तन के युग में भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय चेतना की प्रासंगिकता और अधिक बढ गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भी भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा के मुख्य प्रवाह में सम्मिलित करने का प्रयास किया है।
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Pages:45-48
How to cite this article:
विनय खाण्डेकर, डॉ. स्नेहलता निर्मलकर "भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय चेतना: हिन्दी साहित्य के विशेष संदर्भ में". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 45-48
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