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VOL. 8, ISSUE 3 (2026)
छत्तीसगढ़ की जनजातियों में स्वदेशी ज्ञान लोक साहित्य एवं पर्यावरण चेतना
Authors
डॉ. वर्षारानी पाटले
Abstract
भारत में जनजाति संस्कृति अपने लोग ज्ञान प्राकृतिक केंद्रित होने के कारण विशिष्ट स्थान रखती है । छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से गोड़, कमार, उरांव, आदि जनजातीय ने पीढ़ी दर पीढ़ी लोकगीतों, लोक कहावतो, और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के माध्यम से स्वदेशी ज्ञान को सुरक्षित करते आए हैं। यह ज्ञान केवल सांस्कृतिक विरासत का परिचय नहीं करता अपितु पर्यावरण संरक्षण,जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग एवं नैतिक मूल्यों का आधार भी है। वैष्वीकरण की दौड़ में शहरीकरण, आधुनिकीकरण, नवीन तकनीक के उपयोग से जनजाति जीवन शैली प्रभावित हो रहा है जिसे पारंपरिक लोग जीवन एवं ज्ञान को चुनौती का सामना करना पड़ रहा है । छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ अपनी समृद्ध स्वदेशी ज्ञान परंपरा, लोक साहित्य और पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदनशीलता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके जीवन का आधार जल, जंगल और जमीन हैं, इसलिए वे प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता और पूजनीय मानते हैं। जनजातीय समुदायों ने वर्षों के अनुभव से कृषि, वन संरक्षण, औषधीय पौधों, जल स्रोतों तथा जैव विविधता के संरक्षण का महत्वपूर्ण ज्ञान विकसित किया है। यह स्वदेशी ज्ञान आज भी उनके दैनिक जीवन और आजीविका का आधार है। जनजातीय लोक साहित्यकृजैसे लोकगीत, लोककथाएँ, लोकगाथाएँ, कहावतें और लोकनृत्यकृ प्रकृति के प्रति प्रेम, सम्मान और संरक्षण का संदेश देते हैं। उनके पर्व-त्योहार, जैसे करमा, नवाखाई और मड़ई, प्रकृति तथा कृषि से जुड़े हुए हैं और पर्यावरण के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। जनजातीय समाज आवश्यकता के अनुसार ही वन संसाधनों का उपयोग करता है तथा वृक्षों, नदियों और पर्वतों को पवित्र मानकर उनकी रक्षा करता है। इस शोध के माध्यम से छत्तीसगढ़ के जनजातीय के लोक साहित्य में निहित स्वदेशी ज्ञान और पर्यावरण चेतना का अध्ययन करना तथा पारंपरिक एवं आधुनिकता के मध्य स्थित संबंध का अध्ययन करना है । जनजाति लोक संस्कृति में निहित स्वदेशी ज्ञान का सतत विकास, सांस्कृतिक संरक्षण तथा पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से यह विषय आज भी प्रासंगिक है । अतः इस ज्ञान परंपरा के संरक्षण, प्रलेखन एवं अकादमिक अध्ययन को बढ़ावा देना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है ।
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Pages:49-52
How to cite this article:
डॉ. वर्षारानी पाटले
"छत्तीसगढ़ की जनजातियों में स्वदेशी ज्ञान लोक साहित्य एवं पर्यावरण चेतना". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 3, 2026, Pages 49-52
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