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VOL. 8, ISSUE 2 (2026)
आधे अधूरे - मोहन राकेश के नाटक में चित्राभिनय की सम्भावना
Authors
अमित सक्सेना
Abstract
शोध का मूल उद्देश्य नाट्यशास्त्र में वर्णित अभिनय पद्धति को समसामयिक नाट्य प्रयोग से जोड़ चित्राभिनय की संभावनाएँ ढूँढ़ना है। नाट्यशास्त्र के 26-वें अध्याय में उल्लेखित है की जिन भावों, चेष्टाओं और विविध अभिनय क्रियाओं को एक विशिष्ट रूप में व्यक्त करना हो तो उन्हें चित्राभिनय द्वारा किया जाये। शारीरिक क्रियाओं और भाव-भंगिमा के रचनात्मक और काल्पनिक अभिकल्पन को चित्राभिनय कहते हैं। अभिनय के चार प्रमुख प्रकारों के अतिरिक्त चित्राभिनय की कल्पना नाट्यशास्त्र में क्यों की गयी और उसके सिद्धान्त का हिन्दी रंगमंच में प्रचलित यथार्थवाद को एक नवीनता प्रदान कर पाना इस शोध की दिशा है। और क्या नाट्यशास्त्र केवल संस्कृत नाटकों के प्रदर्शन से ही जोड़ा जाता रहेगा? क्या आधुनिक नाटक की विभिन्न परतों को इस ग्रंथ में वर्णित चित्राभिनय द्वारा अन्वेषण किया जा सकता है? मोहन राकेश के कालजयी नाटक आधे अधूरे की संरचना और संभावित प्रस्तुति में चित्राभिनय की संभावनाओं का अध्ययन करना शोध में सम्मिलित है। चित्रात्मक एवं दृश्यात्मक बिम्ब और रंग संकेतों द्वारा भी कथानक और चरित्र के भावों को अभिनीत किया जाता है। शोध प्रणाली में आधे अधूरे के दृश्यों को चित्राभिनय द्वारा व्यक्त करने का प्रयास सम्मिलित है और यह जाँचना की चित्राभिनय केवल शास्त्रीय नाटकों तक सीमित नहीं है, अपितु समसामयिक यथार्थवादी नाटकों जैसे आधे अधूरे में भी इसकी उपयोगिता देखी जा सकती है जो प्रस्तुति की एक नवीन भाषा को स्वरूप दे सके।
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Pages:37-42
How to cite this article:
अमित सक्सेना
"आधे अधूरे - मोहन राकेश के नाटक में चित्राभिनय की सम्भावना". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 2, 2026, Pages 37-42
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