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VOL. 8, ISSUE 2 (2026)
ख़रामा ख़रामा’: यात्रा साहित्य में पंकज बिष्ट की विशिष्ट दृष्टि का विश्लेषण
Authors
निरुपमा तिवारी
Abstract
समकालीन हिंदी साहित्य जगत में पंकज बिष्ट जी का नाम बड़े ही आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। पंकज बिष्ट ने अपने उपन्यासों और कहानियां के माध्यम से हिंदी कथात्मक साहित्य के क्षेत्र को तो समृद्ध बनाया ही है साथ ही पत्रकारिता और कथेतर साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। उनका यात्रा वृतांत संग्रह ख़रामा-ख़रामा हिंदी यात्रा साहित्य की परंपरा में एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में स्थापित है। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य इस संग्रह के माध्यम से पंकज बिष्ट जी की वैचारिक दृष्टि, संवेदनात्मक गहराई और सामाजिक प्रतिबद्धता का विश्लेषण करना है।अपने द्वारा की गई यात्राओं के दौरान उनकी रचना धर्मिता केवल स्थलों के बाह्य विवरण तक सीमित नहीं रही थी बल्कि इन यात्रा विवरण के माध्यम से वे अपने आंतरिक अनुभव, सामाजिक यथार्थ और संस्कृतिबोध को सशक्त ढंग से अभिव्यक्त कर पाए हैं। पंकज बिष्ट अपनी यात्रा के दौरान साधारण जनजीवन, स्थानीय परिवेश और सामाजिक विसंगतियों को सूक्ष्म दृष्टि से देखते हैं और उन्हें अत्यंत सहज और प्रभावशाली भाषा में अभिव्यक्त करते हैं। उनकी दृष्टि में एक ओर मानवीय संवेदनशीलता और सौंदर्य बोध है तो दूसरी ओर सामाजिक सरोकार और आलोचनात्मक चेतना भी स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। उनकी यह कृति भाषा के सरल, प्रभावपूर्ण और प्रभावशाली प्रयोग के कारण पाठकों को यात्रा के साथ-साथ विचारों की गहराइयों तक ले जाती है। ‘ख़रामा-ख़रामा’ में पंकज बिष्ट की जनपक्षधर दृष्टि, यथार्थ बोध और वैचारिक प्रतिबद्धता इसे एक विशिष्ट यात्रावृतांत संग्रह के रूप में स्थापित करती है। यह शोध पत्र ‘ख़रामा-ख़रामा’ के माध्यम से पंकज बिष्ट की वैचारिक प्रतिबद्धताओं, शैलीगत विशेषताओं तथा यात्रा साहित्य में उनके विशिष्ट योगदान को रेखांकित करने का एक प्रयास करता है।
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Pages:30-33
How to cite this article:
निरुपमा तिवारी "ख़रामा ख़रामा’: यात्रा साहित्य में पंकज बिष्ट की विशिष्ट दृष्टि का विश्लेषण". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 2, 2026, Pages 30-33
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