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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 8, ISSUE 2 (2026)
पत्रकारिता और साहित्य का अंतर्संबंध: इतिहास और वर्तमान
Authors
अवनीश कुमार
Abstract

पत्रकारिता को लेकर हमारे समाज में एक अलग किस्म की धारणा रही है। यद्यपि समय परिवर्तन के साथ-साथ इस धारणा में भी परिवर्तन हुआ है परन्तु विशिष्टता की जो भावना पहले थी वह आज भी बनी हुई है। अंतर केवल इतना है कि पहले पत्रकारिता उसके चुनौतीपूर्ण दायित्वों के कारण विशिष्ट व्यवसाय थी तो आज पत्रकारिता व्यवसाय से जुड़े लोगों के जीवन-यापन और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में उसके हस्तक्षेप के कारण विशिष्टि है। आरंभ में पत्रकारिता की चुनौती कितनी बड़ी थी, इसका अनुमान अकबर इलाहाबादी के इस शेर से लगाया जा सकता है:

 

खींचों न कमान, न तलवार निकालो।

जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।

 

यह शेर हिन्दी के आदि समाचार पत्रों में प्रमुख 'मतवाला' के मुखपृष्ठ पर नियमित प्रकाशित होता था। स्वतंत्रता आंदोलन के उस युग में अंग्रेजी व हिन्दी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों की संख्या में बहुत सीमित थी। देश में पत्रकारिता अपने शैशवकाल में थी। एक ओर व्यवसाय की नवीनता, समाचार पत्रों के मुद्रण और समाचार संकलन की मुश्किलें थीं तो दूसरी ओर औपनिवेशक शासन व्यवस्था, जिसके लिए समाचार पत्र जैसे अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम को स्वतंत्रता प्रदान करना एक किस्म से आत्मघात था। उस युग में पत्रकारिता करना या अखबार निकालना बहुत बड़ी चुनौती थी। पत्रकारिता व्यवसाय न होकर स्वतंत्रता आंदोलन के समान ही एक 'मिशन' (अभियान) थी। लिहाजा पत्रकारिता में ऐसे लोग ही आते थे जिनमें कुछ कर गुजरने की जिजीविषा होती थी और जो अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्थिक संकट, सामाजिक उपेक्षा और शासकीय उत्पीड़न झेलने का जीवट रखते थे। इस कारण उस युग में पत्रकार और पत्रकारिता के प्रति विशिष्टता की धारणा थी।

  यह तब की बात है जब यूरोप के पुनर्जागरण के बाद ग्रेट ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में लोकतंत्र की स्थापना तो हो चुकी थी लेकिन पूर्ववर्ती सामंतों और चर्च की भूमिका भी उनमें बनी हुई थी तब ब्रिटिश राजनैतिक टीकाकार बर्क ने लाईस (सामंत), टेंपोरेल (पादरी) और कॉमन्स (संसद या निर्वाचित जनप्रतिनिधि) को लोकतंत्र के तीन स्तंभ बताते हुए प्रेस को उसे गतिमान रखने वाला चौथा स्तंभ कहा था। तब से आज तक लोकतंत्र और प्रेस दोनों के स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है परन्तु प्रेस की लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानने की धारणा अब भी बनी हुई है। भारतीय संदर्भ में बकें की उक्त धारणा की तुलना में गांधी जी की मान्यता अधिक प्रांसगिक है। गांधी जी पत्रकारिता को शासन से जोड़ने की अपेक्षा उसे एक सामान्य सामाजिक क्रिया-कलाप के रूप में देखते हैं। यथाः "समाचार पत्र का पहला उद्देश्य जनता की इच्छाओं, उसके विचारों को समझना और उन्हें व्यक्त करना है। दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जागृत करना है और तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भयतापूर्वक प्रकट करना है।"
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Pages:1-3
How to cite this article:
अवनीश कुमार "पत्रकारिता और साहित्य का अंतर्संबंध: इतिहास और वर्तमान". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 2, 2026, Pages 1-3
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