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VOL. 8, ISSUE 1 (2026)
जैनेन्द्र के साहित्य में नारी चिंतन का शाश्वत मूल्य: एक मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण
Authors
Babita Devi, Dr. Anand Kumar Rai
Abstract
नारी को व्यक्तित्व प्रदान करने के लिए जैनेन्द्र ने उसके स्वरूप को राजनीति, समाज, परिवार आदि से भिन्न-भिन्न रूपों में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखा है। उनमें भारतीय संस्कृति और मर्यादा की चेतना नहीं है, किन्तु सत्य यह है कि जैनेन्द्र के पात्र अतीत को स्पर्श करते हुए भी वर्तमान में जीते हैं। वे अपनी संस्कृति की कभी उपेक्षा नहीं करते। भौतिकवाद के युग में नारी पुरुष से आगे बढ़ने को तत्पर है। नारी पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती है, किन्तु जैनेन्द्र के अनुसार नारी पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती है। प्रतिस्पर्धा उचित नहीं है। ‘त्यागपत्र’, ‘परख’ आदि में व्यक्त जीवन आदर्श, सामाजिक मर्यादा के पोषक मूल्य हैं। हिन्दी उपन्यासों में मनोविश्लेषणात्मक परम्परा के प्रवर्तक जैनेन्द्र कुमार का स्थान प्रेमचंद के बाद के उपन्यासकारों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैनेन्द्र का कथा साहित्य भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संवाहक रहा है। उन्होंने भारतीय मन को उसकी संस्कृति और परम्परा के परिप्रेक्ष्य में पहचाना है। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं जैसे- ईश्वर, आस्तिकता, नास्तिकता, बुद्धि-भावना, अंतर्जगत-तर्क, हिंसा-अहिंसा, प्रेम और वासना, पति और पत्नी, सतीत्व, शरीर की पवित्रता, पाप-पुण्य, समर्पण इत्यादि।
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Pages:38-40
How to cite this article:
Babita Devi, Dr. Anand Kumar Rai "जैनेन्द्र के साहित्य में नारी चिंतन का शाश्वत मूल्य: एक मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 1, 2026, Pages 38-40
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