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VOL. 8, ISSUE 1 (2026)
हिन्दी की प्रमुख दलित आत्मकथाएं
Authors
डॉ. स्मृति उरांव
Abstract
हिन्दी दलित साहित्य में आत्मकथा एक अत्यंत सशक्त विधा है। जो सदियों के शोषण, अपमान और संघर्ष की मार्मिक दस्तान बयां करती है। प्रमुख आत्मकथाओं में ओमप्रकाश वाल्मिकि की झूलन मोहनदास नैमिराराय की अपने-अपने पिंजरे और तुलसीदास की मुर्द दिया विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दलित साहित्य दलित समाज के प्रश्नों को अपनी रचनाओं में स्थान देता है। आत्मकथा दलित साहित्य के प्रमुख विधा है। उपरोक्त सभी दलित समाज की समस्याओं को भरपूर स्वर मिला है। अभिव्यक्ति के स्तर पर जो तीक्ष्णता और निरक्तता इन रचनाओं में दिखाई देता है। वह अन्यत्र दुर्लभ है। समता, स्थापना और नए समाज की स्थापना नए समाज की निर्माण और जाति आधारित भेदभाव का समूल नाश जैसे लक्ष्यों को संबोधित करने की दृष्टि से ये आत्मकथाएं सफल दिखाई देती है। इनमें मनुष्य की अवमानना के अनेक रूपों को देखा जा सकता है। दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त मनुष्य का दर्द व्यक्तिगत पीड़ा एहसास में आरंभ होकर अंतः एकताबद्ध इकाई के रूप में परिणत हो जाता है। लेखक ने निजी अनुभव अभिव्यक्ति के स्तर से उपर उठकर दलित आंदोलन के अस्त्र बनते दिखाई देते हैं।
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Pages:22-24
How to cite this article:
डॉ. स्मृति उरांव
"हिन्दी की प्रमुख दलित आत्मकथाएं". International Journal of Research in Hindi, Vol 8, Issue 1, 2026, Pages 22-24
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