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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
मध्यकालीन मणिपुरी साहित्य में आगत शब्दों के प्रभाव
Authors
पेबम निर्मला
Abstract
प्रस्तुत शोध आलेख “मध्यकालीन मणिपुरी साहित्य में आगत शब्दों के प्रभाव” में मणिपुरी भाषा में बाहरी भाषाओं से आए शब्दों की ऐतिहासिक, सामाजिक और भाषिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण किया गया है। भाषा की परिवर्तनशील प्रकृति को आधार बनाकर यह बताया गया है कि 18वीं से 19वीं शताब्दी के मध्यकाल में मणिपुरी भाषा ने संस्कृत, बांग्ला, हिंदी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी भाषाओं से अनेक शब्द ग्रहण किए। यह शब्ददृग्रहण केवल संयोग नहीं, बल्कि धार्मिक परिवर्तन, सामाजिक संपर्क, व्यापारिक संबंध, राजनीतिक परिस्थितियों तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण हुआ।
महाराजा भाग्यचंद्र के काल में हिंदू धर्म के प्रसार के साथ रामायण, महाभारत तथा वैष्णव धर्मग्रंथों के पुनर्लेखन और अनुवाद के कारण संस्कृत और बांग्ला शब्दों का व्यापक प्रभाव दिखाई देता है। इसी काल में पान्थोइबी खोंगूल, चायनरोल, चौथारोल कुम्बाबा, सनामही लाइकन, तथा तखेल-ङम्बा जैसे ग्रंथों में बाहरी शब्दों के प्रयोग स्पष्ट मिलते हैं। आलेख में रूप-अपरिवर्तित, रूप-परिवर्तित तथा मिश्रित संरचनाओं का वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह पता चलता है कि कुछ शब्द मूल रूप में स्वीकार किए गए, जबकि कुछ मणिपुरी ध्वनिदृप्रणाली के अनुरूप परिवर्तित हुए।
असम और बंगाल के साथ संपर्क और बाद में अंग्रेज़ों के आगमन ने फ़ारसी और अंग्रेज़ी शब्दों को भी भाषा में स्थान दिया। प्रशासन, युद्ध, न्याय व्यवस्था और शिक्षा से जुड़े शब्द इस प्रभाव के प्रमाण हैं।
अंतः शोध में यह सिद्ध होता है कि मध्यकालीन मणिपुरी साहित्य भाषाई संपर्क और सांस्कृतिक अंतःक्रिया का परिणाम है, जिसमें आगत शब्द केवल बाहरी प्रभाव नहीं बल्कि भाषा की समावेशी प्रवृत्ति, सांस्कृतिक अनुकूलन और ऐतिहासिक विकास के प्रतीक हैं। यह प्रक्रिया आधुनिक मणिपुरी भाषा की शब्द-संपदा और साहित्यिक शैली के निर्माण में महत्वपूर्ण रही।
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Pages:65-68
How to cite this article:
पेबम निर्मला "मध्यकालीन मणिपुरी साहित्य में आगत शब्दों के प्रभाव". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 65-68
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