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VOL. 7, ISSUE 2 (2025)
बाबा नागार्जुन की कविता में लोकचेतना एवं जनसंघर्ष की अभिव्यक्ति
Authors
विशाल प्रताप मित्र
Abstract
बाबा नागार्जुन हिंदी कविता के वो युगप्रवर्तक कवि रहे हैं जिनकी रचनाएँ लोकचेतना एवं जनसंघर्ष की सजीव अभिव्यक्ति बनकर उभरती हैं। उन्होंने कविता को समाज के परिवर्तन का माध्यम बनाया और अपने शब्दों को जनता की आवाज़ में रूपांतरित किया। नागार्जुन का कवि व्यक्तित्व लोकजीवन, किसान आंदोलनों, सामाजिक विषमता के साथ-साथ राजनीतिक अन्याय से गहनता से जुड़ा हुआ था। उनकी कविताएँ यथा अकाल और उसके बाद, भस्म हो गया लोहा, इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ आपको, मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा हूँ इत्यादि उस यथार्थ को व्यक्त करती हैं जहाँ आम जन का दुख, संघर्ष, प्रतिरोध आदि जीवंत हो उठता है। नागार्जुन की कविता में लोकभाषा-जनभाषा का स्वाभाविक प्रयोग उनकी जनसंपृक्ति को और सशक्त बनाता है। वे जनकवि इस अर्थ में हैं कि उनकी कविता में नारे नहीं अपितु जनता की सिसकियाँ एवं हँसी दोनों एक साथ सुनाई देती हैं। उनका व्यंग्य कटु नहीं बल्कि जागृति का माध्यम है; उनकी करुणा दुर्बलता नहीं, प्रतिरोध की शक्ति है। बाबा नागार्जुन के काव्य में लोकजीवन की पीड़ा एवं प्रतिरोध का ऐसा संगम दिखाई देता है जो हिंदी कविता को लोकतांत्रिक संवेदना और सामाजिक यथार्थ का सशक्त स्वर प्रदान करता है। इस शोधालेख में नागार्जुन की कविताओं के माध्यम से यह विश्लेषण करने का प्रयत्न किया गया है कि कैसे उन्होंने साहित्य को जनसंघर्ष, लोकभाषा तथा समाज-सुधार की चेतना से जोड़ा और उसे युग-साक्षी बना दिया।
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Pages:40-43
How to cite this article:
विशाल प्रताप मित्र "बाबा नागार्जुन की कविता में लोकचेतना एवं जनसंघर्ष की अभिव्यक्ति". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 2, 2025, Pages 40-43
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