यह शोध आलेख संत कबीर के काव्य में अंतर्निहित
दार्शनिकता की विविध परतों का विश्लेषण करता है। कबीर की काव्यात्मक अभिव्यक्ति में
जो वैचारिक वैविध्य परिलक्षित होता है, वह केवल आध्यात्मिक अनुभव की बहुलता का द्योतक
नहीं, अपितु तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक जटिलताओं के प्रति उनकी संवेदनशील प्रतिक्रिया
भी है।
इस आलेख में यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि
कबीर-काव्य को केवल निर्गुण भक्ति के दायरे में बाँधना उसकी गहराई और व्यापकता को सीमित
करना होगा, क्योंकि उनकी रचनाओं में सगुण भक्ति के पारंपरिक प्रतीक, सूफी संतों की
प्रेमानुभूति तथा हठयोगी साधकों की रहस्यात्मकता के भी स्पष्ट संकेत मिलते हैं। यह
वैचारिक समन्वय ही उनकी रचनाओं में यदा-कदा दर्शनगत विरोधाभास उत्पन्न करता है, जो
उनके समयबोध, व्यक्तित्व की बहुआयामिता और विचारधारा की जटिलता का प्रमाण हैं।
कबीर की भक्ति-दृष्टि में एक ओर आत्मानुभूत,
निराकार परम तत्त्व की उपासना है, तो दूसरी ओर भक्ति की सगुण परंपरा से प्रभावित व्यवहारिक
उपदेश भी हैं। यह शोध इस 'द्वंद्व' को एक समन्वयात्मक प्रक्रिया के रूप में देखने का
प्रयास करता है, जो भारतीय सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा की समेकित प्रवृत्तियों का
प्रतिनिधित्व करती है। कबीर के दर्शन और काव्य को समझने के लिए आवश्यक है कि उनके विचारों
का मूल्यांकन केवल तात्त्विक रूप में न होकर, सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों के आलोक
में भी किया जाए।
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