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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 7, ISSUE 1 (2025)
डॉ. बच्चन सिंह का साहित्येतिहास-विमर्श
Authors
डॉ. जयंती
Abstract
यह आलेख हिन्दी साहित्येतिहास की अवधारणा, उसकी प्रासंगिकता एवं डॉ. बच्चन सिंह के साहित्येतिहास-दर्शन पर केंद्रित है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कथन के आलोक में यह स्पष्ट किया गया है कि साहित्येतिहास केवल ग्रंथों का विवरण नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना और विकास यात्रा का दस्तावेज होता है। डॉ. बच्चन सिंह साहित्य को एक सांस्कृतिक उत्पादन मानते हुए साहित्य और इतिहास के द्वंदात्मक संबंधों को चिन्हित करते हैं। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल और द्विवेदी जी की इतिहास-दृष्टियों की सीमाओं और अंतर्विरोधों का विश्लेषण कर ‘हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास’ के माध्यम से एक वस्तुनिष्ठ, आलोचनात्मक और परिवर्तनशील साहित्येतिहास-लेखन का मार्ग प्रशस्त किया है। उनके अनुसार साहित्येतिहास लेखन एक गतिशील प्रक्रिया है जो समय के साथ बदलती चेतना और सामाजिक संदर्भों को आत्मसात करती है। जायसी, कबीर और मुक्तिबोध की रचनाओं पर उनकी विश्लेषणात्मक दृष्टि उनकी आलोचक-संवेदनशीलता को दर्शाती है। समग्रतः यह विमर्श हिन्दी साहित्येतिहास को एक नवबौद्धिक अनुशासन के रूप में प्रस्तुत करता है, जो अतीत और वर्तमान के बीच संवाद की प्रक्रिया को पुनर्परिभाषित करता है।
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Pages:17-18
How to cite this article:
डॉ. जयंती "डॉ. बच्चन सिंह का साहित्येतिहास-विमर्श". International Journal of Research in Hindi, Vol 7, Issue 1, 2025, Pages 17-18
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