Logo
International Journal of
Research in Hindi
ARCHIVES
VOL. 6, ISSUE 2 (2024)
इक्कीसवीं सदी के प्रथम दो दशकों के हिंदी उपन्यासों में उत्तर-आधुनिक बाजार-संस्कृति की भयावहता
Authors
सुनील कुमार, डॉ. भरत कुमार
Abstract
’बाजारवाद’ उत्तर-आधुनिक दौर की सर्वाधिक प्रबल प्रवृत्ति ’भूमंडलीकरण’ का उत्पाद है जिसे समकालीन परिपक्व और क्रूर पूँजीवाद का विश्वव्यापी प्रसार कहा जा सकता है। इसने अपने हितों को पोषित करने के लिए सबसे खराब क्रम के ’उपभोक्तावाद’ द्वारा संचालित बाजार संस्कृति को बढ़ावा दिया है। वर्तमान में इस ’बाजारवाद’ का स्वरूप इतना विशालकाय हो गया है कि इसने संसार की लगभग प्रत्येक वस्तु को अपने भीतर समाहित कर लिया है। फलतः जीवन पर इसके बहुत ही भयावह परिणाम सामने आए हैं। इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासकारों ने अपने समसामयिक समाज के इस भयावह यथार्थ और जीवन पर उसके दुष्परिणामों का बहुत ही संवेदनशील और कलात्मक साक्षात्कार करवाया है। इस सदी के उपन्यासों के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि ’बाजारवाद’ के आर्थिक दबावों के चलते निम्न एवं मध्यमवर्गीय परिवारों के व्यक्तियों का जीवन अंतद्र्वंद्वग्रस्त एवं आत्ममनस्तापी होकर अनेक प्रकार के मानसिक रोगों स्किजोफ्रेनिया, डेमेंशिया आदि से ग्रस्त हो रहा है। पागलों और विक्षिप्तों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। लगता है दुनिया का अधिकांश एक पागलखाने में तब्दील हो रहा है।
Download
Pages:22-28
How to cite this article:
सुनील कुमार, डॉ. भरत कुमार "इक्कीसवीं सदी के प्रथम दो दशकों के हिंदी उपन्यासों में उत्तर-आधुनिक बाजार-संस्कृति की भयावहता". International Journal of Research in Hindi, Vol 6, Issue 2, 2024, Pages 22-28
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.