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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 6, ISSUE 2 (2024)
साहित्य की मार्क्सवादी दृष्टि और राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास
Authors
पुष्पा बुढलाकोटी
Abstract
साहित्य अध्ययन और आलोचना पद्दतीयों में विभिन्न विचारों एवं दर्शनों का प्रभाव परिलक्षित होता रहा है अध्येता विभिन्न लेखकों के रचनाकर्म को अलग अलग दृष्टिकोणों में परखने और समझने की कोशिश करते रहे हैं। मार्क्सवादी चिंतन में विचारधारा को एक नजरिया माना गया है। यह नजरिया घटनाओं, परिवर्तनों और स्थितियों के विश्लेषण और समझने का आधार प्रस्तुत करता है। आज के संदर्भ में यह एक ऐसी चेतना है जो अपने सार रूप में राजनीतिक है। यह चेतना समाज में अलग-थलग वर्गों के स्वार्थों से जुड़ी होती है, यानी इसका चरित्र वर्गीय होता है। इतिहास में भी हर वस्तुगत स्थिति को देखने में, उसको समझने में और उसका विवचेन करने में इस वर्गीय चेतना की अंह भूमिका होती है। यह बात जग जाहिर है कि इतिहास हमारी अतीत की चेतना को रूपाकार देता है, इसके साथ ही यह भावी निर्माण के लिए रास्ता भी सुझाता है। इसीलिए इतिहास में विचारधारा की भूमिका को बार-बार रेखांकित किया गया है। मार्क्सवाद भी एक विचारधारा है। इसका आधार वैज्ञानिक और वस्तुवादी है। इसमें चेतना को उचित महत्व देते हुए भी अंतिम विश्लेषण में भौतिक स्थितियों को निर्णायक माना गया है।
मार्क्सवाद आधुनिक चिंतन की एक भौतिवकवादी विचारधारा है जिसने साहित्यिक आलोचना और रचनात्मक लेखन को समृद्ध किया है। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार ‘साहित्य ही समाज का दर्पण है’ अगर इस बात को गहराई से जाने तो हमें  समाज का वास्तविकता प्रतिबिंब तब दिखाई देता है, जब हम साहित्य को मार्क्सवादी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। मार्क्सवादी साहित्य समाज के शोषित और पीड़ित वर्गों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसमें वर्ग संघर्ष, आर्थिक असमानता, और सामाजिक न्याय की मांग की जाती है। 19-20 वीं शताब्दी में समाजवादी और साम्यवादी विचारधाराओं के प्रसार के साथ, हिन्दी साहित्य ने भी इन विचारों को आत्मसात किया और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों को अपने केंद्र में रखा। मार्क्सवादी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त शोषण, असमानता और अन्याय को उजागर करने का प्रयास किया।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिन्दी साहित्य के जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न और यात्राप्रेमी साहित्यकार के रूप में जाने जाते है। उन्होंने साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी लेखनी द्वारा समाज के नए आयामों में जैसे सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक,सांस्कृतिक एवं साम्यवादी-मार्क्सवादी दृष्टिकोण एवं नारी चिंतन को अपने साहित्य का विषय बनाया है। उनके साहित्य में मार्क्सवादी दृष्टि का व्यापक और गहन विश्लेषण पाया जाता है। उन्होंने समाज की वास्तविकताओं को अपने उपन्यासों में जिस प्रकार उकेरा है, वह उन्हें एक सशक्त और विचारशील लेखक के रूप में स्थापित करता है। उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक कृतियाँ नहीं हैं, बल्कि वे समाज सुधार का एक महत्वपूर्ण साधन भी हैं। मार्क्सवादी दृष्टि से उनकी रचनाओं का अध्ययन हमें समाज की गहराईयों को समझने और उनमें सुधार लाने की प्रेरणा देता है। उनके उपन्यासों में समाज की असमानता, शोषण और अन्याय के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाई गई है, जो आज भी प्रासंगिक है।
इस शोध-आलेख के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि राहुल सांकृत्यायन ने अपने साहित्य के माध्यम से न केवल समाज की समस्याओं को उजागर किया है, बल्कि उनके समाधान के लिए भी सुझाव दिए हैं। उनकी रचनाएँ हमें समाज को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती हैं, और साहित्य के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की शक्ति को दर्शाती हैं।
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Pages:1-4
How to cite this article:
पुष्पा बुढलाकोटी "साहित्य की मार्क्सवादी दृष्टि और राहुल सांकृत्यायन के उपन्यास". International Journal of Research in Hindi, Vol 6, Issue 2, 2024, Pages 1-4
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