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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 6, ISSUE 1 (2024)
हरियाणवी लोकजीवन में रचे-बसे भगवान श्रीकृष्ण
Authors
महासिंह पूनिया
Abstract
हरियाणा हरि की भूमि के नाम से विख्यात है। हरि यानि श्रीकृष्ण यहां के लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यहां की लोक परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कहानी, किस्सों, एवं संस्कारों में भगवान श्रीकृष्ण का समागम आज भी जीवंत है। ‘‘यही वो धरा है जहां भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के समय गांडीवधारी अर्जुन को गीता का उपदेश देकर पूरे विश्व में युद्धभूमि पर गीता के संदेश के माध्यम से संपूर्ण जीवन दर्शन दिया। यही वो धरा है जहां पर सूर्य ग्रहण के समय भगवान श्रीकृष्ण द्वारकाधीश के रूप में पहुंचे थे और उनसे मिलने के लिए बृज से गोपियां एवं राधा विशेष रूप से पधारी थी। यही वो भूमि है जहां भगवान श्रीकृष्ण यमुना के तीर, वंशी की मधुर तान गूंजी और फिर यहीं कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में वह युगपुरुष बनकर उतरे।’’1 स्वभावतः यहां का जनमानस इन्हें दूर के अलौकिक तथा अनोखे देव के रूप में नहीं मानता। इनके प्रति लोगों की श्रद्धा वैसी ही है जैसी सामान्य जीवन में किसी निकट के श्रद्धेय के प्रति होती है। यहां के लोक साहित्य के भी कृष्ण बहुत जनप्रिय नायक हैं, जो अब भी गोपिकाओं के साथ रास रचाते से लगते हैं। हरियाणवी लोगों का यह चितचोर देवता कितनी सुखद अनुभूति प्रदान करता है। लोकजीवन एवं भगवान श्रीकृष्ण का परस्पर गहरा नाता है। उनकी लीलाएं आज भी लोक में विद्यमान हैं। उनके विविध रूप, आकार, नामकरण लोकजीवन का ऐसा अटूट हिस्सा हैं जिसके बिना लोक कि परिकल्पना नहीं की जा सकती। सर्वकला सम्पन्न भगवान श्रीकृष्ण अर्थात हरि का अवतरण अथवा आणा के आधार पर ही हरियाणा प्रदेश का नामकरण हुआ। हरि का यान या हरि का आणा आदि की बदौलत ही यह प्रदेश हरियाणा कहलाया। ‘‘हरियाणवी लोकजीवन में नामकरण, लोकगीतों, कहानियों, किस्सों, लोक व्यवहार, कथाओं एवं गाथाओं में भगवान श्रीकृष्ण की लोक पारंपरिक परंपरा का आभास होता है। इसीलिए हरियाणा के रोम-रोम में भगवान श्रीकृष्ण रचे एवं बसे हुए हैं।
कृष्ण साक्षात् विश्व के सोलह कला संपन्न अवतार हैं। वे परब्रह्म जगत रचयिता हैं, युगदृष्टा हैं, युगसृष्टा हैं, आस्तिकों के लिए वे मूर्तिमान संरक्षक हैं, उपासकों के लिए वे भगवान हैं।’’2
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Pages:21-24
How to cite this article:
महासिंह पूनिया "हरियाणवी लोकजीवन में रचे-बसे भगवान श्रीकृष्ण". International Journal of Research in Hindi, Vol 6, Issue 1, 2024, Pages 21-24
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