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VOL. 6, ISSUE 1 (2024)
कबीर की लोकमंगल भावना
Authors
शिव कुमार व्यास
Abstract
जीवन की सार्थकता वास्तव में अथकता के साथ सतत् रूप से कर्म में संलग्न रहने में है, कर्मवत काया के ऐसे ज्ञानी महापुरूष के रूप में कबीर इसके जीवंत प्रमाण है, जिन्होंने जीवन की गति में ही प्रगति का बिंब संजोया। कबीर की आध्यात्मिक अनुभूत के उद्गार तीव्रतर हैं किंतु वे समाजगत् हैं, समाज कल्याण, लोकमंगल की भावना के परिप्रेक्ष्य में वे कुशल व्यावहारिक सिद्ध होते हैं। वे बुरी परिस्थितियों में पाप और निंदय कर्मों में प्रवत्त और अंधे समाज के लिए लाठी बन जाने में अपना अहोभाग्य मानते हैं। उन्होंने जाति, वर्णभेद की खाई को पाटकर संपूर्ण समाज में बंधुत्व तथा एक्य स्थापित करने का कार्य किया। वे संत स्वभाव होकर भी समाज और परिवार को छोड़कर नहीं भागे वरन् समाज की कढ़ियों, अंधविष्वासों धार्मिक आडंबरों, खोखले कर्मकांडो, पतनकारी विचारधाराओं पर आघात करते हुए समाज को जगाते रहे। जाति, वर्ण रंग, धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना कबीर की इसी लोकमंगलकारी साधना का परिचायक है।
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Pages:10-11
How to cite this article:
शिव कुमार व्यास "कबीर की लोकमंगल भावना". International Journal of Research in Hindi, Vol 6, Issue 1, 2024, Pages 10-11
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