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VOL. 5, ISSUE 3 (2023)
प्रेमचंद और ओमप्रकाश वाल्मीकि कृत दलित कहानियों में निहित भाषिक स्वरूप का तुलनात्मक मूल्यांकन
Authors
डॉ. सदानन्द वर्मा
Abstract
प्रेमचंद और ओमप्रकाश वाल्मीकि दोनों साहित्य के क्षेत्र में युग प्रवर्तक रचनाकार हैं। दोनों ही रचनाकारों ने दलित समाज तथा उनकी दैनंदिनी परिस्थितियों पर अपने-अपने तरीके से लेखन कार्य किया है। दोनों ही रचनाकारों का जुड़ाव ग्रामीण पृष्ठभूमि से रहा है। हाँ यह अलग बात है कि जिस तरीके से ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उस समाज के एक-एक पहलुओं के सुखात्मक व दुरूखात्मक स्थितियों का अनुभव किया वैसा अनुभव प्रेमचंद के जीवन में न तो रहा और न ही भोक्ता के रूप में दिखाई ही पड़ता है। लेकिन यह सत्य है कि प्रेमचंद ने जिस दलित समाज और उनकी जिजीविषा का चित्रण अपनी लेखनी के माध्यम से किया है वह यथार्थ के ज्यादा करीब दिखाई पड़ता है। वे अपने आस-पास घटित होते दलित जीवन की दैनंदिनी को जिस रूप में देखा, महशूस किया उसे उसी रूप में समाज के समक्ष चित्रित करने की कोशिश की। जिस प्रकार से प्रेमचंद ने स्वतंत्रतापूर्व के भारतीय समाज की दशा और स्थिति पर अपनी लेखनी चलायी ठीक उसी प्रकार से ओमप्रकाश वाल्मीकि ने स्वतंत्रता पश्चात् की सामाजिक दशा को अपनी रचनाओं में अंकित करने की कोशिश की है। दोनों रचनाकारों के दलित जीवन और उनकी स्थितियों का मूल्यांकन करने से न केवल उनके समय की सामाजिक संरचना में दलितों की स्थिति का यथार्थ स्वरूप उभर कर आता है बल्कि सवर्ण-दलित के मध्य संबंध, स्थितियाँ, आपसी बोल-चाल, रहन-सहन, बात-व्यवहार एवं आतंरिक संबंधों का अवलोकन कर पाना बहुत कुछ सहज हो जाता है। यह अलग बात है कि दोनों रचनाकारों के यहाँ दलित जीवन की जिजीविषा, रोजमर्रा की स्थितियों की वास्तविक स्थिति एवं समाज में उच्च-निम्न के भेद-भाव से उपजी आतंरिक बोध की स्थिति के मूल्यांकन के परिणाम स्वरूप जहाँ बहुत कुछ समानताएं देखने को मिलती हैं तो वहीं बहुत जगह असमानताओं की स्थिति भी दिखाई पड़ती है।
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Pages:1-4
How to cite this article:
डॉ. सदानन्द वर्मा "प्रेमचंद और ओमप्रकाश वाल्मीकि कृत दलित कहानियों में निहित भाषिक स्वरूप का तुलनात्मक मूल्यांकन". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 3, 2023, Pages 1-4
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