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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 5, ISSUE 2 (2023)
भक्तिकाल में सामाजिक समरसता की चेतना
Authors
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता
Abstract
भक्ति-आंदोलन इतिहास का अत्यंत गौरवपूर्ण कालखंड है। भक्ति को काव्य-मूल्य एवं जीवन मूल्य के रूप में स्थापित करने वाली इस कविता का समय मध्यकाल की लगभग चार शताब्दियों तक फैला हुआ हैं। जिसने मध्यकाल के सामंतवादी घेरे में जकड़े मनुष्य को मानवतावादी चेतना प्रदान करने का प्रथम प्रयास किया। भक्तिकाव्य में धर्म और भक्ति की केन्द्रीयता के कारण ये केवल पूजा-पाठ, उपासना, दैन्य और निराश लोगों के दुःखों से मुक्ति और सुख भोगने कि कविता नहीं है बल्कि ये धर्म और भक्ति के आवरण में सामाजिक अन्याय और मानव मूल्य की व्यवस्था के लिये खड़ा होने वाला और उसके लिये संघर्ष करने वाली कविता हैं। भक्तिकाव्य मनुष्यता के प्रति प्रतिबद्धता का काव्य है। जिसके कारण भक्ति काव्य में पहली बार मनुष्य के समानता की बात करते हुए नई मानवतावादी धारा का सूत्रपात होता है। भक्तिकाव्य में पहली बार वर्ग, वर्ण, जाति,नस्ल, धर्म और संप्रदाय के भेद-भाव और बन्धनों को अमान्य घोषित करते हुए मानव मात्र के समानता पर जोड़ देता है। संत कवियों का मुख्य लक्ष्य केवल हिंदू-मुस्लिम एकता, वर्ण व्यवस्था पर प्रहार, धर्मिक पाखंडों पर आक्रमण करना नहीं था बल्कि एक ऐसा संदेश देना था जिसमें सभी मनुष्य सत्यनिष्ठ होकर अपने जीवन का संचालन करें। भक्तिकाव्य लोकजागरण का क्रांतिकारी साहित्य है। जिसमें पहली बार रचनाकारों को अभिव्यक्ति कि आजादी मिली। उन्होंने अपने निजत्व को जनता के समक्ष प्रकट किया। इससे पहले जहाँ कविता राजा और सामंतो कि झूठी तारीफों में लिखी जाती थी वहीं भक्तिकाल के कवि ने अपने एक आदर्श नायक या आम जन को अपनी कविता के केंद्र ला कर लोक के कवि बनें।
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Pages:20-22
How to cite this article:
डॉ. मीनाक्षी गुप्ता "भक्तिकाल में सामाजिक समरसता की चेतना". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 2, 2023, Pages 20-22
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