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VOL. 5, ISSUE 2 (2023)
मुक्तिबोध का समीक्षा संसार और एक साहित्यिक की डायरी
Authors
रामलखन पाल
Abstract
समीक्षक साहित्य का सजग सहृदय होता है अर्थात जिसमें रचना और समीक्षा के प्रति समान भाव हो। एक ओर वह कवि की रसात्मकता का आस्वादन करता है। दूसरी ओर वह अपनी सार्थक समीक्षा के माध्यम से साहित्य की घटनाओं का विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वह न सिर्फ त्रिकालदशÊ होता है बल्कि द्रष्टा, ऋषि और कवि भी होता है अर्थात् वह एक साथ भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों पर अपनी सम्यक दृष्टि रखता है। वह भूत का सम्यक द्रष्टा, वर्तमान का ऋषि और भविष्य का कवि होता है। भारतीय वाड़्मय में ऐसे द्रष्टा, ऋषि और कवि की संख्या बहुत अधिक नहीं है। इस परंपरा की शुरुआत आचार्य भरत से होती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध आचार्य भरत की परंपरा के महत्वपूर्ण समीक्षक हैं। हिंदी की समीक्षा परंपरा में मुक्तिबोध एक ऐसे समीक्षक हैं जिनमें द्रष्टा, ऋषि और कवि तीनों का समन्वय है। द्रष्टा के रूप में भारतीय संस्कृति, इतिहास, धर्म और दर्शन की गहरी समझ रखते हैं। उनकी समीक्षा में इनका गहन विवेचन-विश्लेषण मिलता है। उन्होंने संस्कृति, इतिहास, धर्म, दर्शन आदि के विषय में मौलिक मान्यताओं का प्रतिपादन किया है। ऋषि के रूप में मुक्तिबोध ने अपनी समीक्षा को साहित्यिक वादों-प्रतिवादों एवं खेमेबाजी से मुक्त रखा और समीक्षा को रचना-प्रक्रिया की समानांतर प्रक्रिया के रूप में विकसित किया। उन्होंने सैद्धांतिक समीक्षा, व्यावहारिक समीक्षा, रचना-प्रक्रिया आदि से जुड़े समीक्षा के सभी पक्षों पर ऋषि के समान विचार किया। कवि के रूप में मुक्तिबोध रचना और आलोचना को एक-दूसरे का पूरक मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार समीक्षा दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है। वे कविता को एक व्यक्तिगत-मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया न मानकर सांस्कृतिक प्रक्रिया मानते हैं क्योंकि कवि अपनी कविता में अपने मनोभावों के साथ जीवन-मूल्य भी अभिव्यक्त करता है। जीवन-मूल्य व्यक्तिगत न होकर समाज के होते हैं। समीक्षक में भी जीवन-मूल्य अनिवार्य है। हिंदी साहित्य की समीक्षा परंपरा में मुक्तिबोध की समीक्षा-कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी’ में उपर्युक्त समीक्षा के सभी प्रतिमान दृष्टिगोचर होते हैं।
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Pages:17-19
How to cite this article:
रामलखन पाल "मुक्तिबोध का समीक्षा संसार और एक साहित्यिक की डायरी". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 2, 2023, Pages 17-19
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