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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 5, ISSUE 1 (2023)
कबीर-दर्शन की व्यवहारिकता
Authors
आशा रानी
Abstract
भक्तिकाल का हिन्दीः साहित्य के इतिहास में ही नहीं, वरन् भारतीय इतिहास में भी विशेष महत्त्व है। इस काल के दौरान संवत् 1400 से संवत् 1700 तक चले भक्ति-आंदोलन ने मध्यकालीन विदेशी आक्रमणों की शिकार, पराधीन, शोषित, हताश और व्याकुल जनता को एक रोशनी प्रदान की परंतु धार्मिक कट्टरता के कारण समाज में अशांति का माहौल था। सभी धर्म बाह्य आडंबरों और पाखंडों के साथ अपना - अपना राग अलाप रहे थे। इस होड़ में समाज खंड-खंड हो रहा था। इसी बीच जीवन के परम लक्ष्यों और मानवता के सभी गुणों से दूर लोगों में सच्चे ज्ञान की ज्योति जलाने वाले विचारक एवं समाज-सुधारक कबीरदास जी ने विशेष योगदान दिया। निर्गुण भक्ति-धारा के उपासक और संत-कवि कबीरदास जी ने समाज की कुरीतियांे, साँप्रदायिक वैमनस्यों और पाखंडों पर निर्भीकता से प्रहार ही नहीं किया बल्कि योग-साधना के द्वारा प्राप्य ईश्वर का वास व्यक्ति के हृदय में ही बताकर विवाद को निरर्थक करार दिया। उनके अनुसार, ईश्वर से साक्षात्कार के लिए जीवन में सत्याचरण, शील, संतोष, नाम-स्मरण जैसे उच्च गुणों का होना आवश्यक है और इन गुणों को ग्रहण करने में गुरू के मार्गदर्शन और सत्संगति का विशेष महत्त्व है। इस प्रकार कबीरदास जी ने अपने दार्शनिक विचारों को जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ा और समाज में प्रचलित समस्याओं का व्यवहारिक समाधान प्रस्तुत किया। हरिहर प्रसाद गुप्त जी भी लिखते है- ‘‘कबीर जी ने युग-समस्याओं को पहचाना। उनके समाधान में उनके दर्शन-धर्म का विकास हुआ। उन्होंने धर्म को जीवन से, यथार्थ से जोड़ा-यही सर्जनात्मक स्वरूप ‘कबीर’ को ‘कबीर’ बनाता है’’
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Pages:11-13
How to cite this article:
आशा रानी "कबीर-दर्शन की व्यवहारिकता". International Journal of Research in Hindi, Vol 5, Issue 1, 2023, Pages 11-13
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