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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 4, ISSUE 2 (2022)
सामाजिक और लोकतान्त्रिक जीवनमूल्यों के संरक्षण में साहित्य की भूमिका
Authors
डाॅ. सुरेन्द्र कुमार
Abstract
आज की राजनीति का ‘‘नीति’’ से कोई सम्बन्ध नहीं है, वह केवल ‘‘राज’’ केन्द्रित होकर रह गई है। राजनीति अब जनसेवा का माध्यम न होकर सत्ता-सुख भोगने का एक साधन मात्र बन गई है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लोकमंगल की कामना केवल साहित्य का मूल स्वर है और वह मनुष्य को उसकी सम्पूर्णता में समझने का प्रयास करता है। इसलिए साहित्यकार का लक्ष्य केवल कल्पना के रंगीन लोक में विचरण करके रचना करना नहीं है अपितु समाज और मानव को सही दिशा की पहचान कराना भी है। वह उपदेशक नहीं अपितु उपदेश के मर्म को समझाता है। उत्कृष्ट साहित्य का सृजन ही उत्कृष्ट समाज व लोकतन्त्र की बुनियाद बनता है। अच्छा साहित्य राजनीति के छल-छद्म को उद्घाटित करते हुए भी जनजीवन के विशिष्ट रूप का प्रतिपादन करता है और उसमें अर्थवत्ता भर देता है। इसलिए साहित्य ही मानवता की स्थायी सम्पत्ति है जो युग-युगों तक शाश्वत बनी रहती है। यही कारण है कि प्रत्येक साहित्यिक रचना में समाज के लिए कोई न कोई सूक्ष्म संदेश अवश्य सन्निहित रहता है जोकि साहित्य की मूल संवेदना होती है।
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Pages:18-21
How to cite this article:
डाॅ. सुरेन्द्र कुमार "सामाजिक और लोकतान्त्रिक जीवनमूल्यों के संरक्षण में साहित्य की भूमिका". International Journal of Research in Hindi, Vol 4, Issue 2, 2022, Pages 18-21
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