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VOL. 4, ISSUE 1 (2022)
‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास में पहाड़िया आन्दोलन के ऐतिहासिक संदर्भ
Authors
सियाराम मीणा
Abstract
साम्राज्यवादी, वर्चस्ववादी ताकतों के खिलाफ आदिवासियों का संघर्ष श्रृंखलाबद्ध आन्दोलन के रूप में औपनिवेशिक काल से वर्तमान समय तक अनवरत चल रहा है। औपनिवेशिक काल से लेकर वर्तमान समय तक आदिवासी समुदाय अपनी अस्मिता, अस्तित्व, जल, जंगल जमीन के साथ साथ परंपरागत अधिकारों, स्वशासन को सुरक्षित एवं सरंक्षित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आदिवासियों के इसी संघर्ष को हिन्दी साहित्यकारों में अपनी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान दिया है। इस परम्परा में राकेश कुमार सिंह ने अपने उपन्यास ‘हुल पहाड़िया’ के माध्यम से आदिवासी संघर्ष को सामने लेकर आने का सफल प्रयास किया है। इस उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार राकेश कुमार सिंह ने पहाड़िया आन्दोलन को उभारने का सफल प्रयास किया है। इस उपन्यास में आदिवासियों के संघर्ष का सामूहिक स्वर उभर कर आता है। यह सामूहिक संघर्ष उनकी अस्मिता व अस्तित्व को सुरक्षित एवं सरंक्षित करने का हथियार भी है। औपनिवेशिक काल में आदिवासियों क संघर्ष चेतना परम्परा तिलका मांझी से लेकर सिदो-कानो, बिरसा मुंडा, टंटया भील से जयपाल सिंह मुंडा तक दिखाई देती हैं।
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Pages:24-28
How to cite this article:
सियाराम मीणा "‘हुल पहाड़िया’ उपन्यास में पहाड़िया आन्दोलन के ऐतिहासिक संदर्भ". International Journal of Research in Hindi, Vol 4, Issue 1, 2022, Pages 24-28
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