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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 4, ISSUE 1 (2022)
भारतीय चित्रकला-इतिहास एवं परम्पराः एक अध्ययन
Authors
कुमार रत्नम, अंजली रत्नम
Abstract
भारतीय चित्रकला साहित्य में चित्रकला के संम्बन्ध में जितना सुस्पष्ट, सुबोध और विस्तृत वर्णन चित्रसूत्रम में मिलता है, उतना किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं है। ग्रन्थकार ने यह स्पष्ट बतलाया है कि चित्रकार का काम आसान नहीं है। इसके लिए प्रतिभा साधना और निष्ठा की नितान्त आवश्यकता है। यह कार्य बहुत एवं अति ही गंभीर है। चित्रसूत्रकार ने चित्र में सादृश्य दिखाना ही चित्र की सबसे बडी विशेषता माना है- ‘‘चित्रे सादृश्यकरणं प्रधानं परिकीर्तितम्’’। चित्रकला का समस्त रहस्य खोलते हुए चित्रसूत्रकार कहते हैं कि अच्छे चित्र वहीं हैं जिसमें माधुर्य ओज, सजीवता और जीवित प्राणियों की भांति चेतना हो, वही चित्र शोभन कहे जा सकते हैं। विष्णुधर्मोत्तरपुराण का परिशिष्ट ’चित्रसूत्र’ भरतीय परम्परागत चित्रण-विधा पर एक श्रेष्ठ व्याख्यान है। चित्रकार, चित्रण-प्रक्रिया, चित्रण-तकनीकी, चित्रण-विधि, आकृति-निरूपण, चित्र के महत्वपूर्ण अंग, चित्र के दोष और गुण, चित्रण के लिए तैयारी, चित्र के प्रकार, भित्ती तैयार करना, रेखा विभिन्न प्रयोग, रंगों का बनाना और उनका प्रयोग करना और चित्र को नृत्य के समान बतलाकर अभिनय-प्रक्रिया के माध्यम से रस-निष्पत्ति तक सिद्धि प्राप्त करने की पूरी योजना प्राप्त हो जाती है। भारतीय चित्रकला के परम्परागत चित्रण-विधान और उसकी तकनीकी के विशय में चित्रसूत्र में वर्णित व्याख्यान न केवल महत्वपूर्ण हैं, वरन् वे स्वतः सिद्ध सैद्धान्तिक अवधारणों हैं, जिनकी पुष्टि परम्परागत भारतीय चित्रकला की विभिन्न शैलियों- अजन्ता शैली, राजस्थानी शैली, मुगल शैली और पहाड़ी-शैलियोें में बड़ी ही सरलता से की जा सकती है।
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Pages:1-5
How to cite this article:
कुमार रत्नम, अंजली रत्नम "भारतीय चित्रकला-इतिहास एवं परम्पराः एक अध्ययन ". International Journal of Research in Hindi, Vol 4, Issue 1, 2022, Pages 1-5
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