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VOL. 3, ISSUE 4 (2021)
अशोक के फूल’ निबंध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सांस्कृतिक चिंतन
Authors
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय
Abstract
भारतीय साहित्य में अशोक का प्रवेश उसी तरह से होता है जैसे कोई नववधू अपने ससुराल आती है। जैसे नववधू के आने से घर में खुशियों की लहर दौड़ जाती है, वैसे ही एक जमाना था जब अशोक के फूलों को देखकर लोग वैसी ही खुशी का अनुभव करते थे। कालीदास ने अपने साहित्य में इसे बहुत सम्मान के साथ याद किया है। सुंदरियां इन फूलों को कानों में झुमके की तरह पहनती थी। जब अशोक के लाल-लाल फूल सुंदरियों के गालों पर लटकते और हिलते-डुलते तो उनकी सुंदरता कई गुना बढ़ जाती थी। राजघरानों की रानियां एक उत्सव मनाती थी जिसमें वह नूपुर पहनकर अशोक के पेड़ के निचले तने को अपने पैरों से हल्की-हल्की चोट पहुंचाती थी। माना जाता था कि इससे अशोक के पेड़ में सुंदर फूल आयेंगे। सुंदरियां अबीर, कुंकुम, चंदन और अशोक के फूलों से कामदेव की पूजा करती थी। यह अशोक का फूल भगवान शिव के मन में क्षोभ पैदा करता है। प्रभु श्रीरामचंद्र के मन में सीता का भ्रम पैदा करता है और कामदेव के एक इशारे पर लोगों के जीवन में मधुरता का संचार करने के लिए चल पड़ता है। बौद्ध साहित्य में भी अशोक का उल्लेख मिलता है। रामायण में रावण ने सीता जी को अशोक वाटिका में ही रखा था। इस तरह देखते हम देखते हैं कि अशोक वृक्ष और उसके पुष्पों से जुड़ी एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा भारत में मौजूद थी लेकिन आज अशोक को उस सिंहासन से उतार दिया गया है।
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Pages:22-23
How to cite this article:
डॉ. सन्तोष कुमार पाण्डेय "अशोक के फूल’ निबंध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का सांस्कृतिक चिंतन". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 4, 2021, Pages 22-23
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