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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 3, ISSUE 3 (2021)
राष्ट्रीय चेतना के विकास में हिन्दी साहित्य की प्रासंगिकता ‘रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं के विशेष संदर्भ में‘
Authors
डॉ गार्गी लोहनी
Abstract
भारतीय समाज की पहचान, प्रमुख विशेषता है- यहां की ‘विविधता में एकता‘। वैविध्यपूर्ण संस्कृति का समागम भारतीय सामाजिक व्यवस्था को विश्व स्तर पर एक नई पहचान दिलाती है। साथ ही साथ निरंतर बदलती परिस्थितियां एवं आवश्यकताओं के अनुरूप सामाजिक संरचना के निर्माण एवं उनके व्यवस्थापन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं लेकिन समकालीन समय में परिवर्तन जिस गति से घटित हुआ है, वह सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न समस्याओं के उद्भव का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कारण साबित हो रही है। ऐसे समय में जब दुनिया तेजी से वैश्वीकृत होती जा रही है, पुरातन पंथी और रूढ़िवादी दुराग्रहों के लिए जगह दिनानुदिन सिकुड़ती जा रही है। दुनिया भर में ऐसी शक्तियाँ अपने को बचाये और बनाये रखने के लिए धर्म और सम्प्रदाय यहाँ तक कि निहत्थे और मासूम लोगों को अपना कवच बनाकर सभ्यता और संस्कृति को बचाने का भ्रम फैला रही हैं। कल तक जो हमारी सामाजिक व्यवस्था एवं संस्कृति की गौरवगाथा एवं आकर्षण का केन्द्र था, आज वही समाज की एक लाइलाज बीमारी का रूप धारण कर चुकी है। एक प्रचलित कहावत है- ‘स्वर्ग पहुँचने की जो चाबी है वह नर्क के दरवाजे को भी खोलती है।‘ आज की परिस्थिति के संदर्भ में देखें तो यह कहावत भारतीय सामाजिक व्यवस्था पर सटीक रूप में लागू होती है। जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्र एवं परिवारवाद की जो लहर आज समाज में तेजी से फैली है, उसे राष्ट्रवाद की भावना के द्वारा ही रोका जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हर भारतीयों के दिलों में ‘राष्ट्रवाद‘ की अलख जलाई जाए। यह तभी संभव है जबकि आमजनों तक राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, सामाजिक न्यायवाद, लैंगिक समानतावाद आदि साम्प्रतिक जीवन मूल्यों की प्रकृति और प्रभाव की पहुंच समयानुकूल सुनिश्चित की जा सके। इन भावनाओं और विचारों को आमजनों तक पहुंचाने का सबसे सरल और सशक्त माध्यम है साहित्य। राष्ट्रवाद के विकास का भारतीय संदर्भ राजनैतिक दृष्टिकोण से बहुत प्राचीन नहीं है। यह देश राजनैतिक रूप से न सही भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से बड़े गहरे अर्थों में अत्यन्त प्राचीन काल से एक-सूत्र बद्ध रहा है। सामने दिखाई देने वाली प्रकट बहुविधताओं और विभिन्नताओं के बावजूद जीवन के प्रति अपनी आधारभूत समझ में यहाँ के लोग प्राचीन काल से एक-से रहे हैं। यहाँ तक कि कालान्तर में अन्यान्य भूभागों से आयी प्रजातियाँँ भी यहाँ रच-बस कर यहाँ के लोगों जैसी होती देखी जाती रही हैं। अतः समाजिक-सांस्कृतिक सामंजस्य के इस सातत्य ने भारत की राष्ट्रीयता को एक विलक्षण स्वरूप दे डाला है। विभिन्न साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में इन विलक्षणताओं को बड़ी ही कुशलता के साथ उकेरने का कार्य किया है, जो तात्कालिक ही नहीं बल्कि वर्तमान परिवेश में भी राष्ट्रीय चेतना के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर भी इन्हीं प्रमुख साहित्यकारों में एक हैं। दिनकर को द्वन्द्वों का कवि कहा गया है। अनेक बार उन्होंने स्वयं भी इस ओर संकेत किया है। कहीं वह गांधीवादी विचारधारा का वाहक प्रतीत होते हैं तो कहीं राष्ट्र की रक्षा के लिए एकजुट होकर युद्ध के लिए उत्प्रेरित करते नजर आते हैं। आपने सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय एकता की बात अपनी काव्य रचनाओं में की है, जो आज के समय की भी मांग है। इन्हीं तथ्यों को उजागर करने तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास में हिन्दी साहित्य और खासकर रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं के प्रभावों का विश्लेषण संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत शोध पत्र में किया गया है।
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Pages:29-32
How to cite this article:
डॉ गार्गी लोहनी "राष्ट्रीय चेतना के विकास में हिन्दी साहित्य की प्रासंगिकता ‘रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं के विशेष संदर्भ में‘ ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 3, 2021, Pages 29-32
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