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VOL. 3, ISSUE 3 (2021)
निराला का आत्मसंघर्ष और राम की शक्ति पूजा
Authors
आरती मीणा, श्योराज सिंह ‘बेचैन’
Abstract
निराला (1896ई.-1961ई.) छायावाद (1918ई.-1936ई.) के प्रतिनिधि कवि हैं। छायावादी कविता राष्ट्रीय जागरण की अभिव्यक्ति थी तथा द्विवेदी युगीन साहित्यिक परिस्थितियों के विरूद्ध विद्रोह की उपज थी। विद्रोह का यह भाव निराला में सर्वाधिक था। निराला ने छायावाद को नवजागरण का संदेशवाहक माना था। निराला के काव्य में वस्तुगत छायावादी प्रवृत्तियां- आत्मभिव्यक्त रूढियों से मुक्ति, रहस्यवाद, प्रकृति प्रेम, नारी स्वातंत्र्य की भावना, राष्ट्रीयता की भावना विद्यमान है। निराला के काव्य में छायावादी शिल्पगत प्रवृत्तियों में कल्पनाशील चित्रात्मकता, नाद सौंदर्य, संगीतात्मकता, लाक्षणिकता, प्रतीकात्मकता आदि देखने को मिलती है। छायावादी शिल्प की दृष्टि से ही नहीं आधुनिक कविता के विकास में भी मुक्त छंद निराला की अमूल्य देन है। यह उनकी छंद संबंधी प्रयोगशीलता का सर्वोच्च स्तर है। निराला लिखते हैं ‘‘मुक्त छंद तो वह है, जो छंद की भूमि में भी रहकर मुक्त है........ मुक्त छंद का सर्मथक उसका प्रवाह ही है। वही उसे छंद सिद्ध करता है उसका नियम राहित्य उसकी मुक्ति है। निराला छंद मुक्ति व मानव मुक्ति में गहरा संबंध देखते है। ‘परिमल’ की भूमिका में वे लिखते हंै, ‘‘मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है मनुष्यों की मुक्ति कार्यों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के अनुशासन से अलग हो जाना है।’’ मुक्त छंद स्वाधीन चेतना और स्वछंद भाव की देन हंै, निराला में ये दोनों प्रवृत्तियां स्पष्टतः दिखाई देती है।
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Pages:19-21
How to cite this article:
आरती मीणा, श्योराज सिंह ‘बेचैन’ "निराला का आत्मसंघर्ष और राम की शक्ति पूजा ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 3, 2021, Pages 19-21
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