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VOL. 3, ISSUE 3 (2021)
रीतिकालीन भारतीय समाज और नैतिक शिक्षा
Authors
डॉ सतीश कुमार पांडेय
Abstract
शिक्षा और समाज का पारस्परिक सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। वस्तुतः किसी भी समाज की संरचना, आवश्यकतायें और उसमें उपलब्ध अलग-अलग तरह के स्त्रोत ही उस समाज की शिक्षा की नीति की आधारभूमि निर्धारित करते हैं। कहा भी जाता है कि शिक्षा का स्वरूप वैसा ही होता है जैसा हमारा समाज है और जैसा समाज हम बनाना चाहते हैं। शिक्षा के सामाजिक आधार का अर्थ यह है कि शिक्षा की व्यवस्था समाज की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और आदर्शों के आधार पर की जानी चाहिए। शिक्षा के द्वारा बालकों में ऐसे सामाजिक गुणों को विकसित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें, अधिकारों का उपभोग कर सकें और समाज तथा देश के योग्य, कुशल, जागरूक और समर्पित नागरिक बन सकें। शिक्षा के द्वारा उनमें समाज के साथ अनुकूलन करने की क्षमता विकसित की जानी चाहिए। शिक्षा के उद्देश्यों के निर्धारण का आधार उस समाज का जीवन दर्शन, समाज की संरचना और उसकी धार्मिक,, राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। इसी प्रकार पाठ्यक्रम में उन्हीं विषयों एवं क्रियाओं को सम्मिलित करना चाहिए जो सामाजिक दृष्टि से उपयोगी हों, जो बालकों में सामाजिकता की भावना तथा सामाजिक गुणों का विकास करें और जो व्यक्ति की सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा करें।
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Pages:07-10
How to cite this article:
डॉ सतीश कुमार पांडेय "रीतिकालीन भारतीय समाज और नैतिक शिक्षा ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 3, 2021, Pages 07-10
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