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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
भूमंडलीकरण, बाजार और मीडिया
Authors
रजनी
Abstract
भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण ग्लोबलाइजेशन के हिंदी पर्याय हैं। भूमंडलीकरण राष्ट्रों की सीमाओं को तोड़ ‘ग्लोबल विलेज' की बात करता है अर्थात पूरा विश्व एक गांव है।भूमंडलीकरण एक निरंतर चलने वाली आर्थिक प्रक्रिया है जिसमें किसी देश की अर्थव्यवस्था विश्व की अर्थव्यवस्था में मिलकर उसका अंग बन जाती है।सीधे शब्दों में कहा जाए तो भूमंडलीकरण बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने देश में निवेश करने की अनुमति देना और विदेशी निवेश के लिए द्वार खोल देना है। विद्वानों ने इसे आर्थिक उपनिवेशवाद की संज्ञा भी दी है इसके सांस्कृतिक दुष्प्रभावों को देखते हुए बौद्धिक उपनिवेशवाद के नाम से भी इसे पुकारा है।भूमंडलीकरण मुक्त बाजार व्यवस्था की बात करता है जिसकी संपूर्ण लगाम वर्ल्ड बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के हाथों में निहित है। भूमंडलीकरण के प्रसार में संचार क्रांति का महत्वपूर्ण स्थान है। उसी के पंखों पर बैठकर इसने विश्व के कोने कोने में अपनी पैठ जमा ली है। बहुराष्ट्रीय निगमों ने अपने उत्पादों की बिक्री के लिए तीसरी दुनिया के देशों को अपना बाजार बनाया। इन बाजारों पर पैठ जमाने के लिए इन्होंने मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक) को अपना हथियार बनाया। विज्ञापनों और और कार्यक्रमों के जरिए एक नई ‘उपभोक्ता-संस्कृति’ को जन्म दिया जिसमें हर दर्शक और पाठक एक उपभोक्ता है।इस उपभोक्तावादी नजरिए ने जो कि पूरी तरह से बाजार की शक्तियों से परिचालित हैखबरों को सूचना से बदलकर उत्पाद में परिवर्तित कर दिया जिसे बाजार में बिकना है। अतः उसे चटपटे, मसालेदार रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा।समाचारों से सूचना,यथा-तथ्यता,गंभीरता और वैचारिकता का क्षरण होने लगा।मीडिया पर पश्चिमी मूल्य हावी होने लगे जिसका दुष्प्रभाव संस्कृति पर पड़ने लगा। बाजारवाद के इस दौर में मीडिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न अपनी विश्वसनीयता और साख बचाए रखने का है। केवल सनसनी परोसकर या टीआरपी बढ़ाकर वह अपने दायित्व बोध से मुक्त नहीं हो सकता।
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Pages:56-62
How to cite this article:
रजनी "भूमंडलीकरण, बाजार और मीडिया ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 56-62
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