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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
स्वतंत्रता व विरोध के संदर्भ में उपन्यासकारों का योगदान
Authors
पार्वती
Abstract
भारतीय इतिहास की तरफ देखे तो समाज को सुधारने और देश को परतंत्रता की जंजीरों से मुक्ति दिलाने के प्रयास में जो भाव छिपा था, उसे राष्ट्रीय चेतना कहते हैं। अपने लोगों, अपनी संस्कृति, अपनी प्रकृति से जो प्रेम का भाव होता है, वहीं राष्ट्रीय चेतना है। अपने राष्ट्र के लिए एक समर्पण का भाव इसमें अंतर्निहित होता है। यह भाव जब पूरे देशवासियों में होता है तो वहाँ सहयोग और सहानुभूति पनपती है। दरअसल यह केवल राष्ट्र के प्रति प्रेम ही नहीं, मानव की अस्मिता की पहचान भी है। पुराने ज़माने में भारत छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था। एक ही राजा की प्रजा होने के एहसास से ही भारत में राष्ट्रीय चेतना की शुरुआत हुई होगी। आधुनिक काल में अंग्रेजों के आगमन से इसका विस्तार बढा, जिसका परिणाम हमें 1857 के मुक्ति संग्राम में देखने को मिलता है। इसके बाद अंग्रेजों ने पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा दिया। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने का उद्देश्य ऐसी जनता को बनाना था जो दिखने में हिंदुस्तानी हो पर सोच से अंग्रेज हो। लेकिन इस शिक्षा का दूसरा फायदा यह हुआ कि अंग्रेजी पढ़ने से भारतीय दूसरे देशों के इतिहास, संस्कृति से परिचित होने लगे। वे विश्व के दूसरे देशों से अपनी तुलना करने लगे, दूसरे देशों की क्रांतियों की जानकारी भी उन्हें मिलने लगी। इससे उन्हें अपनी अस्मिता की पहचान होने लगी। इस समय समाज में कई समाज सुधारकों का आविर्भाव हुआ। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद कुछ भारतीय अपने देश को परतंत्रता की जंजीरों से मुक्त कराने के लिये आगे आए। साहित्यकारों ने भी इसमें बढ़-चढ ़कर भाग लिया। हिंदी के साहित्यकार भी इसमें पीछे नहीं रहे। कहानी की विधा में प्रेमचंद का नाम तो सबसे ऊपर आता है। प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से अपने समय के मुक्ति संग्राम में पूरी तरह से अपना योगदान दिया। प्रेमचंद गांधी जी से बहुत अधिक प्रभावित थे। उनके भाषण को सुनकर उन्होंने अपनी आर्थिक समस्या को नजरअंदाज करते हुए सरकारी नौकरी के पद से इस्तीफा दे दिया था। गांधीजी चाहते थे कि इस मुक्ति संग्राम में पुरुषों के कदम से कदम मिलाकर स्त्रियां भी भाग ले। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में गांधीजी के इन भावों को प्रकट करने का प्रयास किया। प्रेमचंद ने स्त्रियों को आगे लाने के लिए ऐसे पात्रों की सृष्टि की जिससे स्त्रियों में राष्ट्रीय चेतना का संचार हो जैसे:- रानी सारंधा, सती आदि कहानी के पात्र।
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Pages:45-48
How to cite this article:
पार्वती "स्वतंत्रता व विरोध के संदर्भ में उपन्यासकारों का योगदान ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 45-48
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