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VOL. 3, ISSUE 2 (2021)
शकुंतिका उपन्यास में युगबोध और जनवादी चेतना
Authors
डाॅं. विद्या शशिशेखर शिंदे
Abstract
एक मानवीय इकाई के रुप में सभ्यता एवं संस्कृति के सर्वांगीण विकास में स्त्रियों की भागीदारी हमेशा से महत्वपूर्ण रही हैं। परिवार और समाज में सहभागिता के अतिरिक्त वह निर्विवाद रुप से पुरुषों के आकर्षण का केंद्र भी रही हैं-भावनात्मक और शारीरिक रुप से भी।ज्यों ज्यों सभ्यता का विकास होता हैं स्थितियाॅं क्रमशः बदलती हैं। जाहिर है बदलते हालात में स्त्री-पुरुष के बीच का परस्पर संबध स्वाभाविक रुप से बदला है और बिगडा भी हैं। स्त्री का परिवार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने के बावजूद उसकी स्थिति महत्वपूर्ण नहीं मानी नही जाती। मानवीय इकाई के रुप में स्त्री और पुरुष का समान महत्व है, यह सैेद्वांतिक रुप से सच होते हुए भी व्यावहारिक रुप से झूठ लगता हैं। स्त्री अस्मिता को लेकर बाहरी और भीतरी मोर्चे का अंतःसंघर्ष लंबे अरसे तक चला और सामाजिक साहित्यिक विमर्श का एक स्वाभाविक एवं खास हिस्सा बन गया। यही कारण है कि समकालीन हिन्दी साहित्य की केंद्रिय संवेदना के रुप में स्त्री चेतना एवं संघर्ष के कई रुप में स्त्रीे लगभग आधी आबादी है इसलिए उसका कोई सपना और संधर्ष एकांगी और निरर्थक नहीं हो सकता।संधर्षधर्मी चेतना से बनते बिगडैे मूल्य ओर हाशिए से मुख्य धारा में आने का संघर्ष समकालीन उपन्यासों में से ‘शंकुतिका‘ इस भगवानदास मोरवालजी के उपन्यास में स्पष्ट रुप में प्रतिबिंबित हुआ हैं। स्त्रियों के भीतर चेतावनी जगाकर उन्हें नये युग में किस तरह आगे बढना है उसकी पे्ररणा देता हैं।
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Pages:28-31
How to cite this article:
डाॅं. विद्या शशिशेखर शिंदे "शकुंतिका उपन्यास में युगबोध और जनवादी चेतना ". International Journal of Research in Hindi, Vol 3, Issue 2, 2021, Pages 28-31
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