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International Journal of
Research in Hindi
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VOL. 2, ISSUE 3 (2020)
प्रेमचंद के कथा साहित्य में निहित मनोवैज्ञानिक विसंगतियां, उनका विश्लेषण एवं प्रासंगिकता
Authors
रंजीता भटनागर
Abstract
वर्तमान युग में व्यक्ति संबंधों में निहित विसंगतियों के कारण मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है। जीवनेच्छा से पूर्ण स्त्री या पुरूष को जब प्रतिकूल वातावरण मिलता है तो उनकी समस्त आकांक्षाए मिट्टी में मिल जाती है। मानसिक विरोध की स्थिति में वह सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता। वर्तमान युग में दाम्पत्य रिष्तों में मनभेद व मतभेद के चलते मानसिक रूप से उथल-पुथल मची हुई है। जिसके परिणामस्वरूप दम्पŸिा परस्पर घुटन, कुंठा, तनाव, द्वेष, ईष्र्या, क्रोध, घृणा, असंतोष, अवसाद, हीनत्व जैसी मनोग्रंथियों के षिंकजें में जकड़े हुये है ये मानसिक ग्रंथियाॅं दाम्पत्य रिष्तों के लिए आज चिंता का विषय बनी हुई है। इन्हीं मनोविकृतियों के पनपने से वैवाहिक जीवन चिंता व षोक का अड्डा बना हुआ है। वर्तमान विषम परिस्थितियों में प्रेमचंद साहित्य में निहित मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों का अध्ययन करना ही हमारे शोध अध्ययन का उद्देष्य है। हिन्दी साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों द्वारा जन-साधारण की मनोदषाओं व मनोविकारों का बड़ा ही सूक्ष्म मनोविष्लेषनात्मक वर्णन किया है। प्रेमचंद जी मनोवैज्ञानिक रचनाकार न होकर भी मानव की अनुभूतियाॅं, अन्र्तद्वन्द्व, संघर्ष आदि प्रवृतियों को मनोवैज्ञानिक विष्लेषण पद्धति द्वारा उघाड़ कर रख देते हंै। भारतीय समाज में सामाजिक कुप्रथाएं, स्वभावगत भिन्नता, अतृप्त कामवासना अनेक ऐसे मनोवैज्ञानिक पहलु हैं जो व्यक्ति में अनेक मनोविकारों व मनोग्रंथियों को जन्म देते हंै जिसके परिणामस्वरूप वह तनाव, घुटन, ऊब, एकाकीपन, अरूचि, क्रोध, जैसे अनेक मनोविकारों को पाल लेता है और स्त्री-पुरूष संबंधों में विघटन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही कारण है कि प्रस्तुत शोध अध्ययन में प्रेमचंद कृत उपन्यास व कहानियों में स्त्री-पुरूष संबंधों में निहित मनोवैज्ञानिक विसंगतियों के कारण आई विकृतियों और विकरालता को समझने का हमारा प्रयास निहित है। प्रेमचंद जी द्वारा रचित सेवासदन, कर्मभूमि, प्रतिज्ञा आदि उपन्यास में मनोवैज्ञानिकता की झाॅंकी देखने को मिलती है। नया विवाह कहानी में स्त्री-पुरूष संबंधों में मानसिक उतार-चढ़ाव एवं एकाकीपन से उपजी निराषा एवं कुंठित मनोविकारांे का प्रस्तुत किया है। युगदृष्टा प्रेमचंद जी ने जहाॅं अपनी उपन्यास एवं कहानियों द्वारा मानव मन के मनोविकारों एवं मनोग्रंथियों को उजागर किया है वहीं वे सुधारवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुये उच्च मानवीय मूल्यों की सुरक्षा, सरंक्षण और विकास में प्रयासरत दिखाई देते हंै। इस प्रकार प्रस्तुत शोध आलेख में वर्तमान मनोवैज्ञानिक विसंगतियों को समझने हेतु प्रेमचंद साहित्य में निहित मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उजागर करने का हमारा प्रयास निहित है।
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Pages:19-21
How to cite this article:
रंजीता भटनागर "प्रेमचंद के कथा साहित्य में निहित मनोवैज्ञानिक विसंगतियां, उनका विश्लेषण एवं प्रासंगिकता". International Journal of Research in Hindi, Vol 2, Issue 3, 2020, Pages 19-21
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